न्यायालय ने महिला के ससुराल वालों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की, कहा: कोई ठोस आरोप नहीं
अविनाश
- 24 Apr 2026, 10:20 PM
- Updated: 10:20 PM
नयी दिल्ली, 24 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक महिला के ससुराल पक्ष के तीन लोगों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को शुक्रवार को रद्द कर दिया।
महिला ने दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
न्यायालय ने कहा कि प्राथमिकी में आरोपियों के खिलाफ धमकी या क्रूरता का कोई ठोस और विशिष्ट आरोप नहीं है।
इसने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष पति की कथित दूसरी शादी में ससुराल पक्ष के आरोपियों की किसी प्रत्यक्ष भूमिका या मंशा को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश करने में विफल रहा है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह फैसला महिला के ससुर, सास और ननद द्वारा केरल उच्च न्यायालय के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनाया।
उच्च न्यायालय ने 2016 में दर्ज उस प्राथमिकी से संबंधित कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जो महिला द्वारा अपने पति और ससुराल के तीन अन्य सदस्यों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी।
महिला की शादी 2007 में हुई थी। महिला ने आरोप लगाया था कि विवाह की शुरुआत से ही उसे दहेज संबंधी प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और उसके पति ने यह तथ्य छिपाकर मई 2013 में दूसरी शादी कर ली कि वह पहले से विवाहित है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''सबसे पहले यह ध्यान देने योग्य है कि शिकायत का मुख्य आधार आरोपी पति के खिलाफ है। उसके खिलाफ शारीरिक हमले, दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना के विशिष्ट आरोप लगाए गए हैं, जो कुछ निश्चित तिथियों और घटनाओं से संबंधित हैं।''
पीठ ने कहा कि प्राथमिकी में सास और ससुर के खिलाफ किसी भी विशिष्ट घटना में दहेज की मांग, धमकी या शारीरिक हमले का कोई स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया है।
अदालत ने कहा कि ननद पर आरोप है कि उसे सोने की बिक्री से पैसे मिले लेकिन उसके खिलाफ किसी प्रकार की क्रूरता या दबाव डालने की कोई विशिष्ट घटना का आरोप नहीं लगाया गया है।
पीठ ने कहा, ''इन तीनों मामलों में आरोप केवल सामान्य रूप से उपस्थिति और उकसावे से जुड़े हैं, न कि ऐसे विशिष्ट कृत्यों से जो व्यक्तिगत रूप से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए (पति या उसके रिश्तेदार द्वारा विवाहिता को प्रताड़ित करना) के तहत अपराध सिद्ध करते हों।''
आईपीसी की धारा 494 के तहत लगाए गए आरोपों पर अदालत ने अपने पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आरोप सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि शिकायतकर्ता प्रथम दृष्टया यह साबित करे कि दूसरे विवाह समारोह में आरोपी की कोई प्रत्यक्ष भूमिका थी।
भारतीय दंड संहिता की धारा 494 उस अपराध से संबंधित है जिसमें पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह किया जाता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि ससुराल पक्ष के तीनों लोग (सास, ससुर, ननद) आरोपी की दूसरी शादी के संपन्न होने में सक्रिय रूप से शामिल थे, या उन्होंने उसे सुगम बनाया।
पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया और तीनों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को भी समाप्त कर दिया।
भाषा सुरेश अविनाश
अविनाश
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