साकेत हादसा: कैंटीन संचालिका ने छात्रों को खाना खिलाया और उन्हें बचाने की कोशिश में खुद जान गंवा दी
वैभव
- 31 May 2026, 08:13 PM
- Updated: 08:13 PM
(श्रुति भारद्वाज)
नयी दिल्ली, 31 मई (भाषा) दक्षिण दिल्ली के साकेत में एक इमारत ढहने से ठीक पहले छात्रों की जान बचाने की कोशिश में अपनी जान गंवाने वाली कैंटीन संचालिका पार्वती ओझा को याद करते हुए एक छात्र ने कहा, "वह हमारी मां जैसी थीं।"
हादसे में जीवित बचे लोगों और मृतकों के परिवार के सदस्यों ने बताया कि नेपाल मूल की 50 वर्षीय पार्वती ओझा पिछले दो दशक से दिल्ली में रह रही थीं और छात्रों को किफायती भोजन उपलब्ध कराती थीं। शनिवार शाम को जब कैंटीन के पास की तीन मंजिला इमारत ढहने लगी, तो वह अंदर मौजूद छात्रों को सचेत करने के लिए दौड़ीं और मलबे में दबने से उनकी मौत हो गई।
वह साकेत मेट्रो स्टेशन के पास इस इमारत से सटी टिन शेड वाली छोटी सी कैंटीन की संचालिका थीं जहां 'एफएमजी', 'नीट' और 'गेट' जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र आते थे।
घटना के समय मौके पर मौजूद 'फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट' (एफएमजी) के एक अभ्यर्थी मूसन ने कहा, "वह हमारी मां जैसी थीं। अपने परिवारों से दूर रहने के कारण, वह यहां हमारा परिवार थीं।"
उन्होंने कहा, "अगर कोई चीज़ मेन्यू में नहीं भी होती थी, तो भी वह हमारे लिए उसे बना देती थीं। हमें वहां कभी भी ग्राहक जैसा महसूस नहीं हुआ।"
परिवार के सदस्यों के अनुसार, जब इमारत हिलने लगी तो कैंटीन के अंदर और आसपास करीब 20 से 25 छात्र मौजूद थे।
पार्वती के रिश्तेदार हरि प्रसाद ओझा ने बताया कि उन्होंने 12 आलू परांठे और चार कोल्ड कॉफी का ऑर्डर पूरा ही किया था, तभी उन्हें कुछ गड़बड़ होने का अहसास हुआ।
उन्होंने कहा, "हम दोनों को अचानक कंपन महसूस हुआ और हम बाहर की तरफ भागे। हमने देखा कि इमारत गिर रही थी और हमें अहसास हुआ कि इसकी चपेट में कैंटीन भी आ सकती है।"
हरि प्रसाद ने कहा, "लेकिन बाहर आने के बाद भी वह छात्रों को आवाज देने और उन्हें बाहर निकालने के लिए वापस अंदर दौड़ीं। वह उन्हें बचाना चाहती थीं। वह कभी वापस नहीं आईं।"
ढहती हुई इमारत का हिस्सा बगल की कैंटीन पर गिर गया, जिससे कई लोग मलबे के नीचे दब गए।
हरि प्रसाद ने बताया कि उस समय कैंटीन के अंदर दो बड़े कूलर चल रहे थे, जिससे काफी आवाज हो रही थी और इस वजह से कई छात्र इमारत के गिरने वाली आवाजें नहीं सुन सके।
पार्वती का शव मिलने के बाद कई छात्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ट्रॉमा सेंटर भी गए।
सैद-उल-अजैब इलाके में वेस्टएंड मार्ग पर स्थित इस इमारत में एक कोचिंग संस्थान, कैफे और कार्यालय थे।
अधिकारियों ने बताया कि घटना के वक्त ऊपरी मंजिल पर निर्माण कार्य जारी था।
भाषा सुमित वैभव
वैभव
3105 2013 दिल्ली