बेंगलुरु इस्कॉन मंदिर की समीक्षा याचिका पर सुनवाई के लिए नयी पीठ के गठन पर विचार करेगा न्यायालय
DailyWorld
- 17 Aug 2026, 04:58 PM
- Updated: 04:58 PM
नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय सोमवार को बेंगलुरु स्थित हरे कृष्ण मंदिर के स्वामित्व से जुड़े मामले में 16 मई, 2025 के फैसले की समीक्षा के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई के लिए एक नयी पीठ गठित पर विचार करने को तैयार हो गया।
शीर्ष न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि बेंगलुरु स्थित हरे कृष्ण मंदिर इस्कॉन बेंगलुरु का है।
उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली इस्कॉन बेंगलुरु की याचिका स्वीकार की थी, जिसमें बेंगलुरु के प्रसिद्ध मंदिर और शैक्षणिक परिसर के नियंत्रण के मामले में इस्कॉन मुंबई के पक्ष में फैसला दिया गया था।
बाद में नवंबर 2025 में न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की पीठ ने 16 मई के फैसले की समीक्षा के अनुरोध वाली इस्कॉन मुंबई की याचिका पर खंडित फैसला सुनाया।
सोमवार को इस्कॉन मुंबई के वकील ने भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ से लंबे समय से चल रहे इस विवाद पर फैसला करने के लिए नयी पीठ गठित करने का अनुरोध किया।
वकील ने बताया कि समीक्षा याचिका को पहले न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली दो अलग-अलग पीठों के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था। इसके बाद से समीक्षा याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''हम इस पर विचार करेंगे।''
उल्लेखनीय है कि 16 मई, 2025 को न्यायमूर्ति अभय एस. ओका, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए कहा था कि यह संपत्ति इस्कॉन बेंगलुरु की है।
पीठ ने कहा था कि निचली अदालत ने भी पाया था कि इस्कॉन मुंबई ने 'शेड्यूल ए' संपत्ति पर अपने कब्जे के संबंध में कोई सबूत पेश नहीं किया और उसके दावे के समर्थन में बिल्कुल कोई प्रमाण नहीं था।
बाद में न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति मसीह ने 16 मई के फैसले की समीक्षा के अनुरोध वाली इस्कॉन मुंबई की याचिका पर अलग-अलग राय दी।
न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने माना कि इस्कॉन मुंबई ने फैसले की समीक्षा के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने दो वाक्यों के आदेश में कहा कि समीक्षा याचिकाओं को खुली अदालत में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अनुमति दी जाती है और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया जाए।
इसका अर्थ था कि न्यायमूर्ति माहेश्वरी के अनुसार मुंबई शाखा को खुली अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए, क्योंकि फैसले में ''स्पष्ट त्रुटि'' होने का सवाल उठता है।
वहीं, न्यायमूर्ति मसीह ने कहा कि समीक्षा याचिकाओं, फैसले और उससे जुड़े दस्तावेजों को ध्यान से देखने के बाद उन्हें फैसले में ऐसी कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं मिली, जिसके आधार पर पुनर्विचार किया जा सके। इसलिए उन्होंने समीक्षा याचिकाएं खारिज कर दीं।
दोनों न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के कारण पीठ ने निर्देश दिया कि समीक्षा याचिकाओं को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष आवश्यक निर्देश के लिए रखा जाए।
इस्कॉन बेंगलुरु ने दो जून, 2011 को कर्नाटक उच्च न्यायालय के 23 मई 2011 के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। संस्था की ओर से उसके पदाधिकारी कोदंडरामा दास ने पैरवी की थी। उच्च न्यायालय ने बेंगलुरु की स्थानीय अदालत के 2009 के फैसले को पलट दिया था।
निचली अदालत ने इस्कॉन बेंगलुरु के पक्ष में फैसला देते हुए उसके कानूनी स्वामित्व को मान्यता दी थी और इस्कॉन मुंबई के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा जारी की थी।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलटते हुए इस्कॉन मुंबई के प्रतिदावे को स्वीकार कर लिया था और प्रभावी रूप से उसे मंदिर का नियंत्रण दे दिया था।
समान नाम और आध्यात्मिक उद्देश्यों वाली दोनों संस्थाएं इस लंबे कानूनी विवाद में आमने-सामने थीं।
कर्नाटक में पंजीकृत इस्कॉन बेंगलुरु का दावा था कि वह स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है और कई दशकों से बेंगलुरु के मंदिर का प्रबंधन कर रहा है। वहीं, सोसाइटीज पंजीकरण अधिनियम, 1860 और बंबई सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1950 के तहत पंजीकृत इस्कॉन मुंबई ने संपत्ति पर अधिकार का दावा करते हुए कहा था कि इस्कॉन बेंगलुरु वास्तव में उसकी एक शाखा मात्र है।
भाषा