भारत में विलुप्ति की राह पर बढ़ रहे गिद्धों ने फिर पकड़ी उड़ान, संरक्षण प्रयासों ने बदली तस्वीर
सिम्मी
- 31 May 2026, 11:42 AM
- Updated: 11:42 AM
(मनीषा रेगे)
मुंबई, 31 मई (भाषा) विषैली पशु-चिकित्सा दवाओं के कारण लगभग दो दशक पहले भारत में गिद्धों की आबादी बेहद कम हो गयी थी और वे आसमान से लगभग लुप्त हो गए थे लेकिन अब 700 से अधिक गिद्धों के कैद में प्रजनन और चरणबद्ध पुनर्वास कार्यक्रमों की बदौलत उनकी वापसी हो रही है तथा देश के संरक्षित बाघ अभयारण्य उनके लिए नए सुरक्षित ठिकाने बन रहे हैं।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) और विभिन्न राज्य सरकारों के नेतृत्व में जारी अत्यंत संकटग्रस्त सफेद-पीठ वाले और लंबी एवं पतली चोंच वाले गिद्धों की पुनर्बहाली परियोजना अब एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुकी है। बीएनएचएस के निदेशक किशोर रिठे ने बताया कि हरियाणा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और असम मेंगिद्धों को प्रायोगिक रूप से जंगल में छोड़ा जा रहा है।
उन्होंने बताया कि जीपीएस और जीएसएम ट्रांसमीटरों के माध्यम से की जा रही निगरानी से उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। उदाहरण के लिए, पेंच बाघ अभयारण्य से छोड़ा गया लंबी चोंच वाला एक गिद्ध केवल 17 दिन में 750 किलोमीटर की यात्रा कर महाराष्ट्र के नासिक पहुंच गया।
हालांकि, रिठे ने कहा कि इस परियोजना की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संरक्षित क्षेत्रों से बाहर भी गिद्धों के लिए भोजन के सुरक्षित स्रोत उपलब्ध हों।
उन्होंने कहा, ''गिद्धों के प्रजनन और पुनर्स्थापन कार्यक्रम की सफलता तभी संभव है जब संरक्षित क्षेत्रों के बाहर भी उनके लिए सुरक्षित वातावरण बनाया जाए। हानिकारक एनएसएआईडी दवाओं को पूरी तरह खत्म करना और सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराना इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।''
बीएनएचएस ने 1999 में भारतीय उपमहाद्वीप में गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट का दस्तावेजीकरण किया था। बाद के शोध में यह साबित हुआ कि डाइक्लोफेनाक नामक पशु-चिकित्सा में प्रयुक्त गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी दवा (एनएसएआईडी) गिद्धों की सामूहिक मौत का मुख्य कारण थी।
पशुओं (विशेषकर गाय, भैंस) के इलाज में इस दवा का उपयोग किया जाता था। जब ऐसे पशुओं की मृत्यु हो जाती थी, तो उनके शवों में डाइक्लोफेनाक के अवशेष मौजूद रहते थे। गिद्ध इन मृत पशुओं को खाते थे और दवा उनके शरीर में पहुंच जाती थी।
इस खोज के बाद 2006 में इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद केटोप्रोफेन, एसेक्लोफेनाक और निमेसुलाइड जैसी अन्य हानिकारक दवाओं पर भी रोक लगाई गई।
गिद्धों को पूर्ण विलुप्ति से बचाने के लिए बीएनएचएस और राज्य वन विभागों ने 'रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स' (आरएसपीबी) के सहयोग से पिंजौर (हरियाणा), राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल), रानी (असम) और भोपाल (मध्य प्रदेश) में चार जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र स्थापित किए।
इन केंद्रों में वर्तमान में 740 गिद्ध रखे गए हैं। अब तक इस कार्यक्रम के तहत 80 गिद्ध उपलब्ध कराए गए हैं और 110 गिद्धों को जंगल में छोड़ा जा चुका है।
पुनर्स्थापन कार्यक्रम के तहत कई महत्वपूर्ण सफलताएं मिली हैं। वर्ष 2020 में हरियाणा में छोड़े गए सफेद-पीठ वाले गिद्ध अब जंगल में प्राकृतिक रूप से प्रजनन करने लगे हैं। इस बीच पश्चिम बंगाल से छोड़े गए 31 गिद्ध सुरक्षित रूप से भारत, नेपाल और भूटान तक फैल चुके हैं। इनमें से किसी भी गिद्ध की मृत्यु हानिकारक एनएसएआईडी दवाओं के कारण नहीं हुई।
महाराष्ट्र गिद्धों की पुनर्बहाली का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। यहां पेंच, ताडोबा-अंधारी और मेलघाट बाघ अभयारण्यों में गिद्धों को छोड़ा जा रहा है।
हाल के वर्षों में संरक्षण का ध्यान विशेष रूप से इन सुरक्षित बाघ अभयारण्यों पर केंद्रित हुआ है, क्योंकि यहां विशाल प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध हैं और घरेलू पशुओं में उपयोग होने वाली हानिकारक दवाओं से मुक्त मृत जानवर यहां पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।
संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार बाघ अभयारण्य गिद्धों को छोड़ने के लिए आदर्श स्थान बन गए हैं क्योंकि यहां हानिकारक पशु-चिकित्सा दवाओं का प्रभाव बहुत कम है। प्राकृतिक भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। चीतल और सांभर जैसे जंगली हिरणों के शव गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन का स्रोत हैं।
बीएनएचएस ने जिन सर्वेक्षणों का हवाला दिया है उनमें कई संरक्षित क्षेत्रों और बाघ अभयारण्यों में गिद्धों की संख्या बढ़ने के संकेत मिले हैं। इससे पता चलता है कि संरक्षण उपाय और बेहतर आवास संरक्षण कई दशकों से जारी गिरावट को पलटने लगे हैं।
यह कार्यक्रम पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, विभिन्न राज्य वन विभागों तथा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संगठनों के सहयोग से संचालित किया जा रहा है।
भाषा गोला सिम्मी
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