तीन हत्याओं के दोषी की रिहाई रोकने का आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय ने किया खारिज
रंजन सुरेश
- 25 Aug 2025, 08:01 PM
- Updated: 08:01 PM
नयी दिल्ली, 25 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सजा समीक्षा बोर्ड के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें पत्नी और दो नाबालिग बच्चों की हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक व्यक्ति की समय-पूर्व रिहाई की याचिका खारिज कर दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘सामाजिक जांच रिपोर्ट’ और परिवीक्षा अधिकारी की राय से पता चलता है कि दोषी में पुनर्वास के लक्षण दिखाई दे रहे हैं और उसे कानून का पालन करने वाले नागरिक के रूप में समाज में पुनः शामिल किया जा सकता है।
इसलिए, न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने सजा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) की 10 दिसंबर, 2024 की कार्यवाही को 22 अगस्त को रद्द कर दिया और आदेश में दिए गए सिद्धांतों एवं टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए, पहले के निर्णय से प्रभावित हुए बिना, मामले को पुनर्विचार के लिए बोर्ड को भेज दिया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि दिल्ली सरकार के एसआरबी को एक नई बैठक बुलानी चाहिए और आठ सप्ताह के भीतर एक तर्कसंगत आदेश पारित करना चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि बोर्ड के तर्क कमज़ोर थे और ऐसा प्रतीत होता है कि यह निर्णय मुख्यतः अपराध की प्रकृति, सामाजिक प्रभाव और पुलिस की आपत्ति पर आधारित था, जिसमें याचिकाकर्ता के जेल के आचरण, मनोवैज्ञानिक आकलन या सुधार की कमी दर्शाने वाले किसी भी साक्ष्य पर सार्थक विचार नहीं किया गया था।
न्यायालय ने कहा, ‘‘इन कारणों से न्यायालय को एसआरबी का निर्णय अपर्याप्त और समय-पूर्व रिहाई से संबंधित स्थापित सिद्धांतों के विपरीत लगता है।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि व्यक्ति पहले ही लगभग 18 वर्ष वास्तविक कारावास और छूट सहित 21.4 वर्ष की सजा काट चुका है।
न्यायालय ने कहा कि उसे कारावास के दौरान 30 बार पैरोल और फर्लो दिए गए और उसका आचरण संतोषजनक बताया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘इन सकारात्मक संकेतकों के बावजूद, बोर्ड ने अपराध की गंभीरता और क्रूरता, दोषी की रिहाई के संभावित सामाजिक प्रभाव और पुलिस के विरोध का हवाला देते हुए उसके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है।’’
इस व्यक्ति को 2005 में पत्नी और दो नाबालिग बच्चों की हत्या के लिए शुरू में मौत की सज़ा सुनाई गई थी।
बाद में उच्च न्यायालय ने इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था।
भाषा रंजन