जब ‘बुरे पड़ोसियों’ की बात आती है, तो भारत को अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा अधिकार: जयशंकर
पारुल नेत्रपाल
- 02 Jan 2026, 08:24 PM
- Updated: 08:24 PM
(तस्वीरों के साथ)
चेन्नई, दो दिसंबर (भाषा) विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शुक्रवार को कहा कि बात जब “बुरे पड़ोसियों” की आती है, तो भारत को अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि अगर कोई पड़ोसी देश भारत में आतंकवाद फैलाना जारी रखता है, तो वह नयी दिल्ली से पानी साझा करने की मांग नहीं कर सकता।
इसके साथ ही जयशंकर ने यह भी कहा कि “अच्छे पड़ोसियों” के मामले में भारत निवेश करने, मदद देने और साझा करने में कभी पीछे नहीं हटता, फिर चाहे वह कोविड-19 महामारी के दौरान टीके हों, यूक्रेन संघर्ष के दौरान ईंधन एवं खाद्य सहायता हो या श्रीलंका को उसके वित्तीय संकट के दौरान दी गई चार अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय मदद हो।
विदेश मंत्री ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कहा कि बात जब “बुरे पड़ोसियों” की आती है, तो भारत को अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है और कोई भी देश को यह नहीं बता सकता कि वह उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे करे।
चेन्नई में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईआईटी) मद्रास में आयोजित संवाद कार्यक्रम में जयशंकर ने कहा, “लोग कूटनीति को ‘रॉकेट साइंस’ की तरह पेश करते हैं। यह तो आम समझ की बात है... आप अपने पड़ोसी के साथ कैसा बर्ताव करते हैं?”
उन्होंने कहा, “अगर आपका कोई पड़ोसी आपके प्रति अच्छा व्यवहार करता है या कम से कम आपको नुकसान नहीं पहुंचाता है, तो आप स्वाभाविक रूप से उसके लिए दयालु प्रवृत्ति रखते हैं और उसकी मदद करते हैं। अगर ऐसे पड़ोसी को कोई समस्या है, तो आप किसी न किसी तरह से उसकी मदद करना चाहेंगे। कम से कम आप उसे नमस्कार करेंगे... आप दोस्ती करने, घनिष्ठता बढ़ाने की कोशिश करेंगे। एक देश के रूप में हम भी यही करते हैं।”
जयशंकर ने कहा, “तो जब आप हमारे आस-पड़ोस पर नजर दौड़ाते हैं, जहां भी वास्तव में अच्छा पड़ोसी होने का भाव दिखता है, तो मुझे लगता है कि आपने देखा होगा कि भारत निवेश करने, मदद देने, साझा करने में कभी पीछे नहीं हटता।”
उन्होंने कहा, “लेकिन जब आपके पड़ोसी बुरे हों और अगर कोई देश जानबूझकर, लगातार, बिना पछतावे के आतंकवादी गतिविधियों को जारी रखने का फैसला करता है, तो हमें आतंकवाद के खिलाफ अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है। हम उस अधिकार का इस्तेमाल करेंगे। हम उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे करते हैं, यह हम पर निर्भर करता है।”
जयशंकर ने कहा, “कोई हमें यह नहीं बता सकता कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अपनी रक्षा के लिए जो भी करना होगा, हम वह करेंगे। यह आम समझ की बात है।”
उन्होंने कहा कि कई साल पहले हम (भारत और पाकिस्तान) जल बंटवारा समझौते पर सहमत हुए थे, “...लेकिन अगर दशकों तक आतंकवाद जारी रहे, तो अच्छे पड़ोसी संबंध नहीं रह जाते। अच्छे पड़ोसी संबंध न होने पर, अच्छे पड़ोसी संबंध के लाभ भी नहीं मिलते। आप यह नहीं कह सकते कि कृपया मेरे साथ पानी साझा करें, लेकिन मैं आपके यहां आतंकवाद जारी रखूंगा। यह संभव नहीं है।”
विदेश मंत्री ने कहा कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए अन्य देशों के साथ संवाद करना जरूरी है, जिसमें भारत के इरादों को गलत तरीके से समझा जाए।
उन्होंने कहा, “लोगों को आपको गलत समझने से रोकने का तरीका है संवाद करना। अगर आप अच्छी तरह, स्पष्ट रूप से और ईमानदारी से संवाद करते हैं, तो अन्य देश और अन्य लोग इसका सम्मान करते हैं और इसे स्वीकार करते हैं।”
जयशंकर ने कहा, “दुनिया भर में बहुत से लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और विरासत पर गर्व करते हैं। मुझे कोई कारण नजर नहीं आता कि हमें ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए।”
उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि प्राचीन सभ्यताओं में से “वास्तव में बहुत कम” ऐसी हैं, जो प्रमुख आधुनिक राष्ट्र के रूप में उभर पाईं और भारत उनमें से एक है।
जयशंकर ने कहा, “हमें अपने अतीत की ऐसी समझ है, जो बहुत कम देशों के पास है... लोकतांत्रिक राजनीतिक मॉडल अपनाने के हमारे फैसले ने ही लोकतंत्र के विचार को एक सार्वभौमिक राजनीतिक अवधारणा बना दिया।”
उन्होंने कहा, “अगर हमने वह रास्ता नहीं अपनाया होता, तो लोकतांत्रिक मॉडल, जैसा कि हम जानते हैं, क्षेत्रीय और संकीर्ण होता... पश्चिम के साथ साझेदारी भी अहम है और इसी तरह हम दुनिया को आकार देते हैं।”
जयशंकर ने कहा कि वह भारत की ओर से बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए दो दिन पहले ही ढाका गए थे।
उन्होंने कहा, “लेकिन व्यापक रूप से, पड़ोसियों के प्रति हमारा रुख व्यावहारिक समझ पर आधारित है। अच्छे पड़ोसियों के मामले में भारत निवेश करने, मदद देने और साझा करने में कभी पीछे नहीं हटता, फिर चाहे वह कोविड-19 के दौरान टीके हों, यूक्रेन संघर्ष के दौरान ईंधन एवं खाद्य सहायता हो या श्रीलंका को उसके वित्तीय संकट के दौरान दी गई चार अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय मदद हो।”
जयशंकर ने कहा कि देशों ने घरेलू स्तर पर विकास करके और फिर विदेश में संबंध स्थापित करके प्रगति की है, जिससे उन्हें प्रगति करने और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य से लाभ हासिल करने में मदद मिली है।
उन्होंने कहा, “जब हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात करते हैं, तो इसका मतलब यह है कि हमने दुनिया को कभी भी शत्रुतापूर्ण या प्रतिकूल स्थान नहीं माना, जिससे हमें खुद को बचाना पड़े। हमारे संसाधन सीमित हैं। सीमित संसाधनों के साथ आप अधिकतम प्रभाव कैसे डाल सकते हैं? वास्तव में यही वह समस्या है, जिसका समाधान तलाशना है।”
जयशंकर ने कहा, “आज भारतीय विदेश नीति और कूटनीति में हम जो करने की कोशिश कर रहे हैं, वह है उस समस्या का समाधान तलाशना। हम अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए और अन्य संस्थानों एवं संभावनाओं का लाभ उठाते हुए ऐसा करने का प्रयास कर रहे हैं।”
अरुणाचल प्रदेश की एक महिला को शंघाई हवाई अड्डे पर रोके जाने के चीनी आव्रजन अधिकारियों के कदम के बारे में पूछे जाने पर विदेश मंत्री ने कहा, “अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और हमेशा रहेगा। इस तरह के हथकंडों से जमीनी हकीकत नहीं बदलने वाली... भारत बिना किसी दबाव के अपने लोगों और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करेगा।”
जयशंकर ने ‘आईआईटीएम ग्लोबल रिसर्च फाउंडेशन’ की भी शुरुआत की, जो आईआईटी मद्रास की एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय पहल है, जिसका मकसद संस्थान को शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता के लिए एक वैश्विक नेटवर्क वाले केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
भाषा पारुल