तेजी से निर्णय लेते हुए प्रौद्योगिकी को लागू करने वाला देश ही आगे रहता है : राजनाथ
सुरेश
- 27 Jan 2026, 07:00 PM
- Updated: 07:00 PM
नयी दिल्ली, 27 जनवरी (भाषा) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया है कि स्वदेशी प्रणालियां देश की परिचालन तैयारियों को मजबूत कर रही हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सोच बन चुकी आत्मनिर्भरता को हासिल करने में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना भी की।
सिंह डीआरडीओ के एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में डीआरडीओ के वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल हुए, जो गणतंत्र दिवस परेड में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
सिंह ने कहा कि प्रौद्योगिकी तेजी से बदल रही है। उन्होंने कहा, ''आज जो भी तकनीक नयी है, वह चार-पांच साल में अप्रासंगिक हो सकती है। इसलिए, आज के समय में, विशेष रूप से युद्धक्षेत्र में, हमें केवल 'सर्वश्रेष्ठ की उत्तरजीविता' के सिद्धांत पर ध्यान देने के बजाय 'सबसे तेज और आगे रहने वालों के सफल होने' के सिद्धांत को भी ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए।
रक्षा मंत्री ने कहा, ''जो देश तेजी से सोचता है, निर्णय लेता है और प्रौद्योगिकी को लागू करता है, वही आगे रहता है।''
उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धक्षेत्र में डीआरडीओ की तकनीक का प्रभावी ढंग से उपयोग किया गया और स्वदेशीकरण के प्रयासों के आधार पर रक्षा क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों में यह संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
सिंह ने आज के प्रौद्योगिकी युग में अग्रणी बने रहने के लिए अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया और डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से नवीन और त्वरित सोच अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने जोखिम लेने से नहीं डरने की अपील भी की।
सिंह ने डीआरडीओ से उन क्षेत्रों से आगे बढ़ने का आग्रह किया, जहां निजी क्षेत्र पहले ही अपनी क्षमताएं विकसित कर चुका है। उन्होंने सुझाव दिया कि संगठन के भीतर एक अलग प्रकोष्ठ का गठन किया जाए जो उन क्षेत्रों में जोखिम उठाए, जहां सफलता की संभावना कम लगती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यदि सफलता प्राप्त होती है, तो यह ऐतिहासिक होगी।
रक्षा मंत्री ने कहा कि डीआरडीओ आमतौर पर डिजाइन और 'प्रोटोटाइप' पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उत्पादन उद्योगों की भूमिका है, और इस अंतर को पाटना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मॉडलों के अनुरूप सह-विकास की रणनीति अपनाई जा सकती है, जिसमें उद्योग को शुरुआती चरणों से लेकर डिजाइन और उत्पादन तक सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है।
रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उपक्रमों के साथ गहन सहयोग स्थापित करने का आह्वान करते हुए कहा कि अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़ने का समय आ गया है। उन्होंने तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमान का उदाहरण देते हुए बताया कि यह डीआरडीओ और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच ज्ञान साझा करने की मिसाल है और एक बड़ी उपलब्धि के रूप में उभरा है।
उन्होंने कहा कि ऐसी कई और उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए डीआरडीओ का अकादमिक जगत और अन्य क्षेत्रों के साथ मिलकर सहयोग करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार का समर्थन तभी सार्थक होगा जब डीआरडीओ एकाधिकारवादी अनुसंधान एवं विकास मॉडल से हटकर एक सहयोगात्मक व्यवस्था की ओर बढ़े।
रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार के आत्मनिर्भरता प्रयासों के कारण आज रक्षा निर्यात बढ़कर लगभग 24,000 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। वर्ष 2014 में यह 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था। उन्होंने इसे और बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि देश ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया है।
उन्होंने कहा कि डीआरडीओ को अपने सिस्टम के डिजाइन चरण से ही निर्यात बाजारों पर विचार करना चाहिए, विशेष रूप से ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और गोला-बारूद पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने से लागत की वसूली होती है, वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ती है और रणनीतिक साझेदारी मजबूत होती है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि डीआरडीओ 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
इस कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ पुरस्कार योजना 2024 के विजेताओं को पुरस्कार भी वितरित किए। इस मौके पर ''द अनप्रेसिडेंटेड सक्सेस स्टोरी ऑफ द फर्स्ट इंडिजिनियस सुपरसोनिक मल्टी-टारगेट सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम-आकाश'' नामक पुस्कत का विमोचन भी किया गया।
भाषा अविनाश सुरेश
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