नाबालिग का गर्भपात का मामला: न्यायालय ने केंद्र और एम्स के खिलाफ अवमानना कार्यवाही बंद की
माधव
- 04 May 2026, 09:39 PM
- Updated: 09:39 PM
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक नाबालिग लड़की का 30-सप्ताह का गर्भ समाप्त करने से संबंधित मामले में केंद्र सरकार और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के खिलाफ एक अवमानना कार्यवाही सोमवार को समाप्त कर दी।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ को अवगत कराया कि 24 अप्रैल के आदेश का पालन कर लिया गया है।
पीठ ने कहा, ''हमें इस अवमानना याचिका पर आगे विचार करने का कोई कारण नहीं दिखता। इसलिए प्रतिवादियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही समाप्त की जाती है।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने मौखिक रूप से कहा कि ऐसे आदेश देना आसान नहीं होता, लेकिन न्यायालय को इन मामलों में निर्णय लेना पड़ता है।
उन्होंने कहा, ''यह हमारे लिए आसान नहीं है। इसमें कोई जीतने वाला या हारने वाला नहीं है, लेकिन हमें बिना भावनाओं में आए निर्णय लेना पड़ता है। मैं आशा करती हूं कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए, यानी अवांछित गर्भ समाप्त करने के लिए अदालत तक न लाना पड़े।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में एम्स चिकित्सकीय गर्भसमापन की जिम्मेदारी नहीं लेता, तो महिला का जीवन खतरे में पड़ सकता है, क्योंकि वह अयोग्य चिकित्सकों के पास जाने को मजबूर हो सकती है।
उन्होंने कहा, ''अवांछित गर्भधारण बढ़ रहे हैं, जिनमें सहमति से बने संबंधों से उत्पन्न मामले भी शामिल हैं। कई मामलों में नाबालिग के सदमे और परिवार को देर से जानकारी मिलने के कारण निर्णय देर से लिया जाता है, जिसके बाद निजी क्लिनिक सहायता देने से इनकार कर देते हैं और अंततः मरीज एम्स तक पहुंचता है।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, "समाज में अवांछित गर्भधारण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। देखिए क्या होता है— वे बताती नहीं हैं, यहां तक कि मां को भी बाद में पता चलता है। जब तक परिवार में निर्णय लिया जाता है, तब तक सात महीने हो जाते हैं। यह बहुत कठिन स्थिति होती है।''
उन्होंने आगे कहा, ''जो लड़की अविवाहित और नाबालिग है, उसके गर्भवती होने का सदमा और परिवार का निर्णय— कानून में कमी है या समाज की प्रवृत्ति; किसी न किसी को इसका उत्तर तो देना ही होगा।''
शीर्ष अदालत 15-वर्षीय एक नाबालिग लड़की की मां द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केंद्र और एम्स पर 30 सप्ताह का गर्भ समाप्त करने के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया गया था।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एम्स की उस याचिका पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त करने की मांग की गई थी, जिसके तहत 15-वर्षीय लड़की को 30 सप्ताह का गर्भ चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी गई थी।
भाषा सुरेश माधव
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