घर में रहने वालों को स्पष्ट करना होगा कि मौत कैसे हुई : न्यायालय
दिलीप
- 25 May 2026, 08:46 PM
- Updated: 08:46 PM
नयी दिल्ली, 25 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि यदि कोई अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होता है, तो घर में रहने वालों पर यह स्पष्ट करने का दायित्व होगा कि पीड़ित की मृत्यु कैसे हुई।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने अपनी पत्नी सोमा आचार्य के साथ क्रूरता करने और उसकी हत्या करने के मामले में गौर आचार्य नाम के व्यक्ति की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
पीठ ने कहा कि महिला का पति पीड़िता के शरीर पर लगी चोटों का कोई तर्कसंगत स्पष्टीकरण देकर उसे समझाने में नाकाम रहा।
न्यायालय ने कहा, ''यह सर्वविदित है कि यदि कोई अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होता है, तो हालांकि मामले को साबित करने का प्रारंभिक भार अभियोजन पक्ष पर होगा, लेकिन पीड़ित की मृत्यु कैसे हुई, इसका ठोस स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी घर में रहने वालों की भी होगी।''
इस मामले को कई लोगों के लिए आंखें खोलने वाला बताते हुए, पीठ ने पूछा, ''क्या सोमा आचार्य की जान बचाई जा सकती थी? क्या सामाजिक बदनामी के डर से सोमा को भेड़ियों (ससुराल वालों) के हवाले कर दिया गया? ये सवाल काल्पनिक ही रहेंगे।''
न्यायालय ने कहा कि शादी के कुछ ही दिनों बाद, सोमा को दहेज के लिए काफी प्रताड़ित किया गया और उसने बार-बार अपने माता-पिता से उसे बचाने की गुहार लगाई और यहां तक कि वह अपने मायके भी आई और कुछ दिनों तक उनके साथ रही।
पीठ ने कहा कि जब भी सोमा ने यह मुद्दा उठाया, तो केवल सुलह कराने और उसे ससुराल वापस भेजने की कोशिश की गई।
शीर्ष अदालत ने कहा कि गांव के लोग भी इसमें शामिल थे और कथित सुलह के बाद उसे ससुराल भेजा गया।
न्यायालय ने कहा, ''सोमा के प्रियजनों को विश्वास था कि किसी तरह स्थिति सुधर जाएगी। उनमें झूठी आशावादिता घर कर गई थी।''
पीठ ने कहा, ''सोमा की अपने ससुराल में दुखद मौत हो जाने से उनकी उम्मीदें टूट गईं। उम्मीद है कि उसके जीवन की कहानी कई लोगों के लिए सबक साबित होगी।''
सबूतों की जांच करते हुए, पीठ ने कहा कि गौर आचार्य के मामले में, निचली अदालत और उच्च न्यायालय, दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब पीड़िता मृत पाई गई थी, तब वह उसके साथ घर में मौजूद था।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''चिकित्सकीय राय स्पष्ट रूप से मौत के बाद फंदे से लटकाने या हत्या की ओर इशारा करती है। आरोपी संख्या 1 का यह कर्तव्य था कि वह पीड़िता की मृत्यु का उचित और संभावित कारण बताता और साथ ही मृत्यु से पहले पीड़िता को लगी चोटों की व्याख्या भी करे।''
पीठ ने कहा कि डॉक्टर के साक्ष्य और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को निचली अदालतों ने हत्या के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सही ही स्वीकार किया है।
न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत ने आरोपी के पिता को बरी कर दिया, क्योंकि सबूतों में कुछ भी सामने नहीं आया और उच्च न्यायालय ने गौर आचार्य की मां और भाई को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत अपराध से बरी कर दिया, क्योंकि वे एक ही परिसर में होने के बावजूद एक ही कमरे में नहीं रह रहे थे।
न्यायालय ने गौर आचार्य की अपील खारिज करते हुए त्रिपुरा के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वह फरार पति का पता लगाने के लिए तुरंत एक टीम गठित करें और उसे तुरंत हिरासत में लें।
भाषा सुभाष दिलीप
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