विवाहित बेटी को 'परिवार' की परिभाषा से अलग रखना स्पष्ट रूप से मनमाना : न्यायालय
दिलीप
- 02 Jun 2026, 07:52 PM
- Updated: 07:52 PM
नयी दिल्ली, दो जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को व्यवस्था दी कि विवाहित बेटियों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति से बाहर नहीं रखा जा सकता है और 'परिवार' की परिभाषा में उन्हें शामिल नहीं करना स्पष्ट रूप से मनमाना, अनुचित और संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के उद्देश्य से 'परिवार' की परिभाषा में विवाहित बेटी शामिल नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था एक महिला द्वारा दायर अपील पर दी, जो एक मृत राशन डीलर की विवाहित बेटी है। उसने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अनुकंपा के आधार पर उचित मूल्य की दुकान पर डीलर के रूप में नियुक्ति के उसके दावे को खारिज कर दिया गया था।
महिला ने 2019 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी, जिसमें विवाहित बेटियों को 'परिवार' की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
शीर्ष अदालत ने फैसला दिया कि विवाहित बेटी को परिभाषा से बाहर रखना उचित नहीं है, क्योंकि आश्रित कोटा के तहत डीलरशिप आवंटन का उद्देश्य वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे मृत व्यक्ति के परिवार को तत्काल सहायता प्रदान करना है।
पीठ ने कहा, ''प्रासंगिक विचारणीय बिंदु हैं निर्भरता, वित्तीय आवश्यकता, निवास और डीलरशिप से जुड़े दायित्वों को पूरा करने की आवेदक की क्षमता। वैवाहिक स्थिति का इनमें से किसी भी विचारणीय बिंदु से कोई तार्किक संबंध नहीं है।''
न्यायालय ने कहा कि विवादित प्रावधान इस धारणा पर आधारित है कि विवाह के बाद बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य या आश्रित नहीं रह जाती है और ऐसी धारणा संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
पीठ ने कहा, ''विवाह न तो बेटी और उसके माता-पिता के बीच के बंधन को समाप्त करता है और न ही आश्रित नहीं होने का कोई वैध आधार प्रदान करता है। समकालीन सामाजिक वास्तविकताएं दर्शाती हैं कि कई विवाहित बेटियां अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, उनका भरण-पोषण करती हैं या उन पर आश्रित बनी रहती हैं। इसी प्रकार, ऐसे बेटे भी हो सकते हैं, जो परिभाषा में शामिल होने के बावजूद परिवार पर आश्रित नहीं हैं। निर्भरता एक तथ्यात्मक प्रश्न है और केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर इसका निर्णायक निर्धारण नहीं किया जा सकता है।''
न्यायालय ने फैसले में कहा कि इस योजना में विवाहित बेटे को शामिल होने से बाहर नहीं रखा गया है, क्योंकि वह अपनी वैवाहिक स्थिति के बावजूद परिवार के दायरे में बना रहता है, जबकि बेटी को केवल इसलिए बाहर कर दिया जाता है, क्योंकि वह विवाहित है।
पीठ ने टिप्पणी की, ''यह भेद लिंग आधारित एक रूढ़िवादी सोच पर आधारित है कि शादी के बाद बेटी दूसरे परिवार की सदस्य बन जाती है और मायके से उसके सारे संबंध समाप्त हो जाते हैं।''
इसने कहा, ''इस तरह की धारणा समानता की संवैधानिक गारंटी के साथ असंगत है और लैंगिक असमानता की ऐतिहासिक धारणाओं को कायम रखती है, जिसे संविधान समाप्त करना चाहता है।''
न्यायालय ने राज्य की इस दलील को खारिज कर दिया कि विवाहित बेटी स्थानीय निवास की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती है और इस तर्क को पूरी तरह से असमर्थनीय माना।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में, रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह साबित होता है कि महिला अपनी शादी के बाद भी उसी गांव में रहती है और उचित मूल्य की दुकान के संचालन में अपनी मां की सक्रिय रूप से सहायता करती रही।
पीठ ने कहा, '' अपनी मां के निधन के बाद, अपीलकर्ता ने अपनी बहनों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी संभाली, जिसमें एक दृष्टिबाधित बहन भी शामिल है।''
न्यायालय ने कहा, ''अधिकारियों ने इन तथ्यात्मक कथनों का खंडन नहीं किया है। उनकी अर्जी खारिज करने का एकमात्र आधार यह था कि वह विवाहित पुत्री हैं। एक बार जब यह आधार संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित हो जाता है, तो उनके पक्ष में राहत प्रदान करने में कोई बाधा नहीं रह जाती।''
भाषा धीरज दिलीप
दिलीप
0206 1952 दिल्ली