हत्या के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 40 साल की देरी पर न्यायालय ने जताई चिंता
नरेश
- 09 Jun 2026, 02:48 PM
- Updated: 02:48 PM
नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने हत्या के एक आरोपी द्वारा अपनी सजा को चुनौती देने वाली 40 साल पुरानी आपराधिक अपील के निपटारे में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा की गई असाधारण देरी पर चिंता व्यक्त की है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर की आंशिक कार्यदिवस (पीडब्ल्यूडी) पीठ ने सोमवार को स्थिति को चिंताजनक बताया और सवाल उठाया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए कौन से नवीन उपाय अपनाए जा सकते हैं क्योंकि ये लंबित मामले न्याय व्यवस्था को बाधित करते हैं।
यह मामला विजय सिंह से संबंधित है। उसे नवंबर 1983 में अपने भाई की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और तब उसकी उम्र 28 वर्ष थी।
कानपुर की एक सत्र अदालत ने उसे हत्या का दोषी पाया और दिसंबर 1985 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
सिंह ने इस फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसकी अपील लगभग 41 वर्षों तक लंबित रही और आखिरकार इस वर्ष नौ फरवरी को उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए 20 पृष्ठों के फैसले के माध्यम से याचिका खारिज कर दी गई।
सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने गौर किया कि सिंह ने हिरासत में केवल लगभग तीन महीने बिताए थे और अपनी अपील के नतीजे का इंतजार करते हुए लगभग 43 वर्ष तक जमानत पर रहा था।
अदालत ने अपने समक्ष कार्यवाही लंबित रहने के दौरान उसकी जमानत जारी रखने का फैसला किया।
पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मामलों के निपटारे में लगातार हो रही लंबी देरी पर चिंता व्यक्त की और कहा कि लंबित मामलों की संख्या अधिक होने के कारण याचिकाकर्ता अक्सर शीघ्र सुनवाई के निर्देश का अनुरोध लेकर उच्चतम का रुख करते हैं।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और अधिवक्ता जोहेब हुसैन से पुराने मामलों के निपटारे में तेजी लाने के उपायों पर सुझाव मांगे। दवे ने सुझाव दिया कि लंबित मामलों की संख्या कम करने के लिए तीन दशकों से अधिक समय से लंबित अभियोजन अपीलों को खारिज किया जा सकता है।
हालांकि, पीठ ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया और कहा कि न्यायिक निर्णय के मूलभूत सिद्धांत केवल मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने के आधार पर उन्हें खारिज करने की अनुमति नहीं देते।
पीठ ने चेतावनी दी कि इस तरह का दृष्टिकोण जनहित को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है और पक्षों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के अवसर से वंचित कर सकता है।
शीर्ष अदालत में अपनी अपील में सिंह ने लंबे समय तक हुई देरी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अब उनकी उम्र 72 साल है और उन्होंने अपनी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था आपराधिक दोषसिद्धि के साए में बिताई है।
याचिका में कहा गया है, ''चार दशकों से अधिक समय से, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और अब वृद्धावस्था के दौरान वह दोषसिद्धि के साए में जी रहे हैं।''
याचिका में यह भी कहा गया है कि सुनवाई से पूर्व उनकी आपराधिक अपील उच्च न्यायालय में 40 वर्षों तक लंबित रही और खारिज कर दी गई।
भाषा सुरभि नरेश
नरेश
0906 1448 दिल्ली