चीन का 'एथनिक यूनिटी' कानून तिब्बती पहचान को खत्म करने की कोशिश: पेनपा सेरिंग
वैभव
- 10 Jun 2026, 11:34 AM
- Updated: 11:34 AM
नयी दिल्ली, 10 जून (भाषा) केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के सिक्योंग (प्रमुख) पेनपा सेरिंग ने आरोप लगाया कि चीन के नए 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ' का उद्देश्य केवल मंदारिन भाषा को बढ़ावा देना और तिब्बती पहचान को ''नष्ट'' करना है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस कानून के विरोध में 26 जून को दिल्ली सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले तिब्बती समुदाय के लोग प्रदर्शन करेंगे।
चीन की संसद ने 12 मार्च को 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ' को पारित किया था। यह कानून एक जुलाई, 2026 से प्रभावी होगा।
सेरिंग ने मंगलवार को यहां एक कार्यक्रम में कहा, ''इस महीने की 26 तारीख को हम दिल्ली में चीन के नए एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस कानून के विरोध में एक कार्यक्रम आयोजित करेंगे। कम्युनिस्ट शासन अक्सर ऐसे कार्यक्रमों को आकर्षक नाम देता है, जिनका लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस कानून का मूल उद्देश्य तिब्बती पहचान को समाप्त करना है।''
अपने संबोधन में उन्होंने तिब्बत को प्रभावित करने वाली चीन की नीतियों की आलोचना की। उन्होंने दलाई लामा के अगले उत्तराधिकारी के चयन पर चीन के दावे को लेकर भी आपत्ति जताई।
निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रमुख सेरिंग ने आरोप लगाया कि चीनी शासन के अधीन तिब्बतियों पर ''व्यापक निगरानी और नियंत्रण'' है, जो जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास '1984' की वास्तविकता जैसा प्रतीत होता है, जहां राज्य सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में है, जहां 14वें और वर्तमान दलाई लामा भी निवास करते हैं।
बाद में संवाददाताओं से बातचीत में सेरिंग ने आरोप लगाया कि चीन की नीति ''राष्ट्रीयताओं'' की अवधारणा को समाप्त करने की दिशा में है, ताकि राष्ट्रीयता संबंधी मुद्दे ही न रहें।
उन्होंने कहा, ''वे तिब्बत के लोगों को बदलने, केवल मंदारिन भाषा सिखाने, बौद्ध धर्म के स्वरूप में परिवर्तन करने और तिब्बती आबादी को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका लक्ष्य ऐसा देश बनाना है जहां केवल मंदारिन बोली जाए और लोग वही आचरण करें जो कम्युनिस्ट पार्टी चाहती है। दुर्भाग्य से वहां किसी को भी वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है।''
सेरिंग ने आरोप लगाया कि मार्च में पारित इस कानून और पिछले चार-पांच वर्षों से बोर्डिंग स्कूलों, मठों तथा अन्य संस्थानों पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों का उद्देश्य ''सांस्कृतिक नरसंहार'' के स्तर तक पहुंचता है।
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, 12 मार्च को 14वीं नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (एनपीसी) के चौथे सत्र के समापन पर पारित इस कानून का उद्देश्य देश के 56 जातीय समूहों के बीच राष्ट्रीय एकता, सामूहिक समृद्धि और सामाजिक समरसता को कानूनी आधार प्रदान करना है।
सेरिंग ने दावा किया कि इस कानून के परिणामस्वरूप तिब्बती भाषा और संस्कृति का एकरूपीकरण होगा। उन्होंने कहा, ''विविधता किसी भी संस्कृति की समृद्धि का आधार होती है, जबकि एकरूपीकरण अन्य पहचानों और संस्कृतियों को समाप्त करने का प्रयास है।''
प्रदर्शनों के बारे में उन्होंने कहा कि मुख्य कार्यक्रम दिल्ली में आयोजित होगा और इसके जरिए लोगों को इस कानून के प्रभावों के बारे में जागरूक किया जाएगा।
उन्होंने कहा, ''एक जुलाई से यह कानून लागू होने जा रहा है, इसलिए हम देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन आयोजित करेंगे।''
सेरिंग ने आरोप लगाया, ''पूरी नीति तिब्बती पहचान को समाप्त करने के उद्देश्य से बनाई गई है। यदि तिब्बती भाषा का प्रयोग बंद हो गया तो वह मृत भाषा बन जाएगी।''
भाषा मनीषा वैभव
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