संगठित अपराध, राजनीतिक हिंसा पर भाजपा के दो विधेयकों को लेकर नागरिक स्वतंत्रता पर चर्चा छिड़ी
सुरेश
- 28 Jun 2026, 09:15 PM
- Updated: 09:15 PM
कोलकाता, 28 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार सिंडिकेट, जबरन वसूली करने वाले गिरोहों और राजनीतिक हिंसा के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा करते हुए विधानसभा में कानून-व्यवस्था से जुड़े दो विधेयक पेश करने जा रही है।
इन विधेयकों से संगठित अपराध और सार्वजनिक अव्यवस्था से निपटने के लिए राज्य की शक्तियां काफी बढ़ जाएंगी, लेकिन साथ ही इनसे नागरिक स्वतंत्रता और सरकार के हद से ज्यादा दखल को लेकर विपक्ष की चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।
पश्चिम बंगाल जन सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026 और पश्चिम बंगाल सार्वजनिक व्यवस्था संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026 सोमवार को विधानसभा में पेश किए जाएंगे।
कानूनी प्रावधानों के अलावा, ये दोनों विधेयक पश्चिम बंगाल में भाजपा की जबरदस्त चुनावी जीत के बाद हो रहे वैचारिक बदलाव को भी साफ तौर पर दिखाते हैं – यानी 'सबको साथ लेकर चलने वाली राजनीति' से 'सख्ती से लागू करने वाली राजनीति' की ओर बदलाव।
पहला विधेयक ''समाज-विरोधी गतिविधि'' की परिभाषा को काफी व्यापक बनाता है और अधिकारियों को यह अधिकार देता है कि वे ऐसे लोगों को बिना किसी मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रखने का आदेश दे सकें, जिन्हें सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। यह उन लोगों को पनाह देने या उनकी मदद करने को भी अपराध बनाता है, जिनके खिलाफ हिरासत के या राज्य से निष्कासन के आदेश जारी किए गए हैं।
प्रस्तावित कानून में "गुंडों" को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है। इसमें आदतन अपराधी, संगठित आपराधिक समूहों के सदस्य और वे लोग शामिल हैं जो जबरन वसूली, जमीन पर कब्जा करने, अवैध खनन, प्राकृतिक संसाधनों की तस्करी और हथियार, नशीले पदार्थों एवं विस्फोटक से जुड़े कानूनों के तहत अपराध जैसी गतिविधियों में शामिल हैं।
इसके अलावा, यह पुलिस को तलाशी लेने, जब्ती करने और गिरफ़्तार करने के व्यापक अधिकार देता है; साथ ही, इस कानून के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाने का प्रस्ताव है।
दूसरे विधेयक के जरिये 'पश्चिम बंगाल जन सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 1972' में संशोधन प्रस्तावित है। इसके तहत दंगों, आगजनी, हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और सार्वजनिक अव्यवस्था के दौरान हुए नुकसान के लिए मुआवजा वसूलने का तरीका लागू किया जाएगा।
इस प्रस्ताव के तहत, एक 'दावा आयोग' सरकारी एजेंसियों और निजी व्यक्तियों को हुए नुकसान का आकलन करेगा। मुआवजा न केवल हिंसा में सीधे तौर पर शामिल लोगों से, बल्कि कथित आयोजकों, फाइनेंसरों, उकसाने वालों और लॉजिस्टिकल सहायता देने के आरोपी लोगों से भी वसूला जा सकेगा।
भुगतान न करने पर जमीन के लगान की वसूली जैसी कार्रवाई हो सकती है, और बकाया राशि वसूलने के लिए दोषी व्यक्ति की संपत्ति ज़ब्त करके नीलाम की जा सकती है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "मकसद सीधा है: कानून-व्यवस्था बहाल करना, संगठित अपराध के तंत्र को तोड़ना और यह सुनिश्चित करना कि जो लोग सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, वे इसकी भरपाई करें। कानून का पालन करने वाले नागरिकों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
भाजपा के कई नेताओं ने हाल के वर्षों में पुलिस थानों, सरकारी दफ्तरों और कानून लागू करने वाले कर्मियों पर हुए हमलों का हवाला देते हुए मज़बूत कानूनी उपायों की ज़रूरत को सही ठहराया है।
विपक्ष, हालांकि इसे ज़्यादा अहम मामला मानता है। तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के नेताओं ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह प्रशासन को ऐसी असाधारण शक्तियां देने की कोशिश कर रही है, जिनका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विरोध प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ किया जा सकता है।
तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने हाल ही में प्रस्तावित कानूनों को राज्य में दशकों में देखे गए सबसे कड़े कानूनों में से एक बताया है और इनकी तुलना विवादित 'एहतियाती हिरासत' और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों से की है।
तृणमूल के एक वरिष्ठ नेता ने आरोप लगाया कि इन विधेयकों में "सार्वजनिक व्यवस्था और असामाजिक गतिविधियों के व्यापक दायरे में असहमति को अपराध की श्रेणी में लाने का जोखिम है।"
भाषा प्रशांत सुरेश
सुरेश
2806 2115 कोलकाता