एसीएफआई ने 'स्लो पॉइज़न' के ट्रेलर पर आपत्ति जताई, सीबीएफसी से दावों की जांच की अपील
अजय
- 09 Jul 2026, 07:21 PM
- Updated: 07:21 PM
नयी दिल्ली, नौ जुलाई (भाषा) एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसीएफआई) ने जल्द आने वाली फिल्म 'द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस' के ट्रेलर में कृषि रसायन उत्पादों के खिलाफ लगाए गए 'गुमराह करने वाले और बिना सबूत के आरोपों' पर कड़ी आपत्ति जताई है। साथ ही, एसीएफआई ने सीबीएफसी से फिल्म को 24 जुलाई को रिलीज किये जाने से पहले इन दावों की जांच करने का आग्रह किया है।
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) के अध्यक्ष, शशि शेखर वेम्पति को दिए गए एक ज्ञापन में एसीएफआई ने बृहस्पतिवार को कहा कि फिल्म में किए गए दावे भारतीय किसानों की छवि खराब करते हैं और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूद नियामकीय एवं कानूनी सुरक्षा उपायों को कमजोर करते हैं।
एसोसिएशन ने कहा, ''इन दावों को तथ्यों के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन कोई स्रोत, तरीका, भौगोलिक संदर्भ या वैज्ञानिक आधार नहीं बताया गया है।'' उन्होंने कहा कि भरोसेमंद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से मिले सबूत बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते हैं।
एसीएफआई के निर्देशक, जनरल कल्याण गोस्वामी ने कहा कि ट्रेलर ''भारत की कृषि और खाद्य प्रणालियों को डरावने और सनसनीखेज तरीके से पेश करता है'' और बिना किसी वैज्ञानिक सबूत के आधुनिक कृषि तरीकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य व सामाजिक मुद्दों के बीच सीधा संबंध दिखाता है।
गोस्वामी ने बयान में कहा, ''यह देखना चौंकाने वाला है कि फिल्म की कहानी न केवल वैज्ञानिक रूप से बेबुनियाद है, बल्कि यह भारत की कृषि संबंधी प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाती है और हमारे किसानों की आजीविका व राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करती है।''
एसोसिएशन ने मांग की है कि प्रमाणन और सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले किसी भी गुमराह करने वाले, बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए, बिना पुष्टि वाले या बिना सबूत वाली सामग्री या विषयवस्तु पर ध्यान दिया जाए।
भरोसेमंद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के आंकड़ों का हवाला देते हुए एसीएफआई ने कहा कि खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, भारत में सालाना कीटनाशकों की खपत लगभग 40,094 टन है।
एसोसिएशन ने कहा, ''इन उत्पादों का इस्तेमाल खेतों में मंजूरशुदा कृषि तरीकों के अनुसार किया जाता है; इसका मतलब यह नहीं है कि लोग 50,000 से ज्यादा टन कीटनाशक खा रहे हैं।''
इसने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत सरकार समर्थित अध्ययनों का भी हवाला दिया, जिनसे पता चलता है कि जांच किए गए 96.5 प्रतिशत से ज्यादा कृषि उत्पादों में कीटनाशक अवशेष की तय सीमा का पालन किया गया है और उन्हें खाने के लिए सुरक्षित माना जाता है। एसीएफआई ने यह भी कहा कि ट्रेलर में कैंसर के मामलों और खेती की उपज के बीच सीधा संबंध दिखाने की कोशिश, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचो) द्वारा कैंसर के मुख्य जोखिम कारकों के तय आकलन से मेल नहीं खाती।
इसने ट्रेलर में मौत के आंकड़ों को पेश करने के तरीके की आलोचना करते हुए कहा कि इससे कीटनाशकों से जुड़ी मौतों के कारणों और संदर्भ के बारे में गलतफहमी पैदा होती है।
फिल्म में भारतीय भोजन को 'धीमा जहर' बताने को किसानों के लिए बेहद दुखद बताते हुए, एसीएफआई ने कहा कि इस तरह के चित्रण से देश के भीतर लोगों का भरोसा कम होता है और इसके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बुरे नतीजे हो सकते हैं।
एसोसिएशन ने अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करने का आह्वान किया, खासकर उन विषयों पर जो सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और राष्ट्रीय हित से जुड़े हों। उसने चेतावनी दी कि फिल्म का चित्रण भारत की प्रतिष्ठा, उसकी विनियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता और खाद्य व कृषि क्षेत्र की आर्थिक मजबूती को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकता है।
भाषा राजेश राजेश अजय
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