गुवाहाटी के लोगों ने महफूजखाना ढहाने की आलोचना की; मुख्यमंत्री ने इसे गुलामी की निशानी बताया
खारी नरेश
- 31 Mar 2025, 04:01 PM
- Updated: 04:01 PM
गुवाहाटी, 31 मार्च (भाषा) गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के तट पर स्थित महफूजखाने को ढहाए जाने को लेकर शहर के लोगों ने कड़ा विरोध जताया है और कुछ लोगों ने ऐतिहासिक ढांचे को ‘‘संरक्षित न करने’’ के लिए सरकार की आलोचना की।
यह महफूजखाना असम के सबसे पुराने ढांचों में से एक है।
मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने रविवार को सरकार की कार्रवाई का बचाव किया और कहा कि यह गुलामी की निशानी था, कोई ‘‘पुरातात्विक स्थल नहीं’’।
गुवाहाटी महानगर विकास प्राधिकरण (जीएमडीए) द्वारा ब्रह्मपुत्र रिवरफ्रंट सौंदर्यीकरण परियोजना के हिस्से के रूप में कथित तौर पर इस ढांचे को ढहा दिया गया।
महफूजखाने का उल्लेख 2014 में जीएमडीए द्वारा प्रकाशित एक कॉफी टेबल बुक ‘फॉरएवर गुवाहाटी’ में मिलता है, जिसमें कहा गया है कि निर्माण के वर्ष का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है पर माना जाता है कि यह 1855 के बाद बना था।
इसमें कहा गया, ‘‘बीस इंच मोटी दीवार वाले इस तरह के ढांचे शहर में सिर्फ दो हैं जिनका 1897 का भूकंप भी कुछ नहीं बिगाड़ पाया। इस 86 गुणा 77 फुट के महफूजखाने का इस्तेमाल नक्शे, प्रशासनिक आदेश और सभी प्रकार के भूमि रिकॉर्ड रखने के लिए किया जाता था।’’
जीएमडीए के सूत्रों के अनुसार महफूजखाना को लगभग एक साल पहले ढहाया गया था और उसी परिसर में स्थित एक अन्य ढांचे को कुछ दिन पहले गिरा दिया गया।
इस मामले को शहरवासियों द्वारा सोशल मीडिया पर उठाया गया जिसमें ढांचे को ध्वस्त करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया गया और कहा कि इसे रिवरफ्रंट सौंदर्यीकरण परियोजना के हिस्से के रूप में विकसित किया जा सकता था।
लेखक मृणाल तालुकदार ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा, ‘‘अपमानजनक! असम के सबसे पुराने कंक्रीट ढांचे (1855) महफूजखाने को जीएमडीए ने पार्क के लिए ध्वस्त कर दिया। यह ढांचा संभवतः पूर्वोत्तर भारत का सबसे पुराना था। यह 1897 और 1950 के भूकंपों से बचा रहा जो 45 फुट की साल की बीम पर टिका था और 170 वर्षों से अधिक समय तक रिकॉर्ड की रखवाली करता रहा, लेकिन अब तबाह हो गया। यह विरासत के खिलाफ अपराध है।’’
मुख्यमंत्री ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के निशानों को हटाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, ‘‘अंग्रेजों द्वारा बनाई गई कुछ संपत्तियों को हटाने की जरूरत है। इन्हें रखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि ये गुलामी की निशानी हैं।’’
शर्मा ने कहा, ‘‘डीसी बंगला, डीएफओ बंगला, ये सभी पराधीनता के प्रतीक हैं। प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी कहा है कि इन्हें संरक्षित करने का कोई मतलब नहीं है।’’
मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि महफूजखाना कोई पुरातात्विक स्थल नहीं है।
सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक संजीव कुमार ने भी ढांचे को तोड़े जाने पर अपना रोष प्रकट किया।
भाषा खारी