आठ महीने बाद भी भूस्खलन प्रभावित मुंडक्कई और चूरलमाला भूतिया शहर जैसे दिख रहे, हर तरफ सन्नाटा
संतोष मनीषा
- 31 Mar 2025, 04:07 PM
- Updated: 04:07 PM
(के प्रवीण कुमार)
वायनाड (केरल), 31 मार्च (भाषा) वायनाड जिले के चूरलमाला में एक दुकान की छाया में चिलचिलाती गर्मी से राहत के लिए खड़ी 56 वर्षीय सुहरा जोसेफ ‘बेली ब्रिज’ के उस पार मलबे को देख रही थीं, जहां कभी उनका घर हुआ करता था।
वह उस जगह से लौटी थीं, जहां उनके घर का नामोनिशां अब पूरी तरह से मिट चुका है। पिछले साल 30 जुलाई को केरल में आए सबसे भयानक भूस्खलन के दौरान विशाल चट्टानों के चपेट में आकर उनका घर बह गया।
वह अनिच्छा से छाया में लौटीं, क्योंकि वह अकेली थीं और उन्हें डर था कि कहीं वह चिलचिलाती धूप में बेहोश हो कर गिर न पड़ें। सुहरा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मुझे घर और खोई हुई संपत्तियों की कोई चिंता नहीं है, लेकिन मैं इस तथ्य को भूल नहीं पा रही हूं कि जो लोग हमारे इतने करीब थे, वे सब चले गए हैं।’’ इतना कहते-कहते आंसू उनकी आंखों से छलक गए।
सुहरा इसलिए बच गईं क्योंकि वह अपने पति के इलाज के लिए अस्पताल में थीं। एक रात पहले अस्पताल में उनसे मिलने आए सभी पड़ोसी मारे गए।
आपदा के आठ महीने बाद मुंडक्कई और चूरलमाला एक भूतिया शहर की तरह दिख रहे हैं, जहां चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है।
कभी पर्यटकों की चहल-पहल का केंद्र रही वायनाड के मेप्पाडी की यह खूबसूरत घाटी अब निवासियों या आने वाले पर्यटकों से रहित है। यहां तक कि प्रकृति भी ठहरी हुई प्रतीत होती है, क्योंकि कीचड़ और पत्थरों से ढका यह क्षेत्र अब भूरे रंग का दिख रहा है और मलबे से कोई नया पौधा नहीं उग रहा। रात होते ही जंगली जानवरों का इस क्षेत्र पर राज होता है और हाथी अक्सर मलबे के बीच घूमते नजर आते हैं।
आपदा स्थल पर अक्सर जाने वाले फैजल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैं, बस उस स्थान को देखने जा रहा हूं जहां मेरे चाचा और चाची रहते थे। हमने सभी को खो दिया है - मित्र, परिवार। यह सन्नाटा असहनीय है।’’
फैजल ने गहरे दुख के साथ कहा, ‘‘उनमें से कई अब भी यहीं कहीं गहराई में दफन हैं। यह जगह हमारे रिश्तेदारों के लिए कब्र की तरह है और आगंतुक इसका सम्मान नहीं कर सकते।’’ उन्हें पता है कि अगर इस जगह को पर्यटकों के लिए खोल दिया गया तो यहां पर्यटकों की बाढ़ आ जाएगी।
स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को एक ज्ञापन दिया था, जिसमें उनसे पर्यटकों के लिए इस जगह को न खोलने का अनुरोध किया गया था।
मेप्पाडी पंचायत के तीन वार्डों--पुंचीरीमट्टम, मुंडक्कई और चूरलमाला में कोई भी निवासी नहीं बचा है। यहां तक कि प्रकृति के प्रकोप से बाल-बाल बचने के बाद जो भी घर सुरक्षित बचे थे, वे भी अब बंद हैं।
मुंडक्कई में एक खेतिहर श्रमिक ने कहा, ‘‘मैं यहां एक दशक से भी ज्यादा समय से एक खेत पर काम कर रहा हूं। हर सुबह, मैं उस सड़क से जाता था जो भूस्खलन के कारण विलुप्त हो गई है। मैं यहां सभी को जानता था..., और अब कोई नहीं है। अब, जब मैं खेत के दूसरी सड़क से जाता हूं, तो यादें लगातार मेरे दिमाग में कौंधती रहती हैं - यह बहुत मुश्किल है।’’
यह वह सन्नाटा है जिससे लोग डरते हैं। घरों की कतारें हैं पर कोई इंसान नहीं रहता है। एक ऐसी जगह वीरान पड़ी है जो कभी हरी-भरी थी। विशाल चट्टानों ने सालों की एकजुटता और अस्तित्व को नष्ट कर दिया। अब पुंचीरीमट्टम में केवल एक, तीन सदस्यीय आदिवासी परिवार बचा है।
चूरलमाला कस्बे के एक दुकानदार ने कहा, ‘‘आपदा से पहले आपको इस कस्बे में मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए भी जगह नहीं मिलती थी। यह बहुत चहल-पहल वाला शहर था, और मैं इस तीन मंजिला इमारत से मिलने वाले किराए से अपना गुजारा कर रहा था।’’
अब वह अपने भवन के एक हिस्से में कच्चे नारियल और अचार वाली सब्जियां बेच रहे हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण करने की कोशिश कर रहे हैं।
क्षेत्र के दुकान मालिकों का कहना है कि उन्होंने राजस्व मंत्री और मुख्यमंत्री दोनों को कई ज्ञापन सौंपे हैं, लेकिन उन्हें आज तक कोई जवाब नहीं मिला है।
सरकार ने क्षेत्र में पर्यटन की अनुमति नहीं देने का फैसला किया है, और केवल पास धारकों को ही मुंडक्कई और पुंचिरिमट्टम तक पहुंचने के लिए बेली ब्रिज पार करने की अनुमति है।
भाषा संतोष