शीर्ष अदालत ने राजस्थान सरकार को स्कूलों में राजस्थानी को विषय के रूप में लागू करने के निर्देश दिए
माधव
- 12 May 2026, 09:22 PM
- Updated: 09:22 PM
नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के सभी स्कूलों में चरणबद्ध और प्रगतिशील तरीके से राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शुरू करने के लिए सकारात्मक और समयबद्ध कदम उठाए।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार को मातृभाषा-आधारित शिक्षा से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक व्यापक नीति बनाने का भी निर्देश दिया, विशेषकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 के संदर्भ में।
पीठ ने कहा कि राज्य सरकार को शैक्षणिक उद्देश्य से राजस्थानी भाषा को स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता और उचित दर्जा देने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
न्यायालय ने कहा, ''उपरोक्त निर्देश इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि वर्तमान में इस महत्वपूर्ण संवैधानिक क्षेत्र में स्पष्ट शून्यता बनी हुई है।''
पीठ ने आगे कहा, ''विशेष रूप से सार्थक और समावेशी शिक्षा तक पहुंच से जुड़ी हुई संवैधानिक गारंटी और नीतिगत घोषणाएं केवल कार्यपालिका की निष्क्रियता के कारण निष्प्रभावी नहीं रह सकतीं।''
शीर्ष अदालत ने यह फैसला नवंबर 2024 में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनाया।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें राज्य सरकार को बच्चों को राजस्थानी या स्थानीय भाषा में शिक्षा देने सहित अन्य निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ''मूल स्तर पर, अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में निहित अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है, क्योंकि इस अधिकार में ऐसी भाषा में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है, जो सार्थक और समझने योग्य हो।''
पीठ ने चिंता जताई कि केंद्र सरकार द्वारा इतनी स्पष्ट नीतिगत घोषणा के बावजूद, राज्य स्तर पर इन प्रतिबद्धताओं के वास्तविक क्रियान्वयन में काफी कमी दिखाई देती है।
न्यायालय ने कहा कि यह विशेष रूप से ''चिंताजनक'' है कि राजस्थान सरकार ने अपनी लगातार निष्क्रियता को सही ठहराने के लिए एक संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया है।
अदालत ने कहा, ''इन परिस्थितियों में यह न्यायालय संविधान के पाठ, विधायी प्रावधानों और बाध्यकारी न्यायिक मिसालों में स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त अधिकारों के इस गंभीर क्षरण का मूक दर्शक नहीं बना रह सकता।''
पीठ ने कहा कि नीति निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करना अदालत का काम नहीं है, लेकिन यह न्यायालय का गंभीर संवैधानिक दायित्व है कि संविधान के भाग-तीन में निहित मौलिक अधिकारों को कार्यपालिका की निष्क्रियता या उदासीनता के कारण निष्प्रभावी न होने दिया जाए।
अपील स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और अनुपालन रिपोर्ट के लिए मामले को 30 सितंबर को सूचीबद्ध किया।
भाषा सुरेश माधव
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