जलवायु परिवर्तन से दुनियाभर की नदियों में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही, भारत भी अछूता नहीं: वैज्ञानिक
अमित
- 16 May 2026, 09:42 AM
- Updated: 09:42 AM
वाशिंगटन, 16 मई (एपी) वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण नदियों में धीरे-धीरे ऑक्सीजन कम होती जा रही है, जिससे मछलियों और नदियों में रहने वाले अन्य जीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। एक नए अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है।
चीन के शोधकर्ताओं ने उपग्रहों और कृत्रिम मेधा (एआई) के जरिए वर्ष 1985 से दुनियाभर की 21,000 से अधिक नदियों में ऑक्सीजन स्तर का अध्ययन और विश्लेषण किया।
'साइंस एडवांसेज' पत्रिका में शुक्रवार को प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, 1985 से अब तक नदियों में ऑक्सीजन का स्तर औसतन 2.1 प्रतिशत घट गया है।
पहली नजर में यह गिरावट बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर लगातार बढ़ता जाता है और यदि यही रफ्तार रही या और इसमें तेजी आयी तो इस सदी के अंत तक पूर्वी अमेरिका, भारत और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की कई नदियों में ऑक्सीजन का स्तर इतना कम हो सकता है कि मछलियों का दम घुटने लगे और ये 'ऑक्सीजन रहित' बन जाए।
वैज्ञानिकों ने बताया कि रसायन विज्ञान और भौतिकी के मूल सिद्धांत के अनुसार गर्म पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है। मानव गतिविधियों से बढ़ रहे जलवायु परिवर्तन के कारण पानी गर्म हो रहा है और इससे अधिक ऑक्सीजन वातावरण में निकल जाती है।
अध्ययन में पाया गया कि यदि ऑक्सीजन घटने की मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो इस सदी के अंत तक दुनिया की नदियां औसतन चार प्रतिशत अतिरिक्त ऑक्सीजन खो देंगी और कुछ मामलों में यह गिरावट पांच प्रतिशत के करीब पहुंच सकती है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक एवं नानजिंग स्थित 'चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज' के पर्यावरण वैज्ञानिक ची गुआन के अनुसार, यही वह स्थिति है जब ऑक्सीजन की कमी यानी 'डीऑक्सीजनेशन', मछलियों व नदियों पर निर्भर लोगों के लिए गंभीर समस्या बन जाती है।
'जीवनविहीन क्षेत्र' बढ़ने का खतरा
वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि नदियों में ऑक्सीजन का स्तर इतना नीचे जा सकता है कि वहां 'जीवनविहीन क्षेत्र' बनने लगें, जैसा कि मैक्सिको की खाड़ी, चेसापीक खाड़ी और लेक एरी में देखा गया है।
ची गुआन ने कहा, ''डीऑक्सीजनेशन बहुत धीमी प्रक्रिया है, लेकिन यदि यह लंबे समय तक जारी रही तो इसका नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर नकारात्मक असर पड़ेगा। ऑक्सीजन का निम्न स्तर जैव विविधता में गिरावट, जल गुणवत्ता में कमी और मछलियों की मौत जैसी कई पारिस्थितिक समस्याएं पैदा कर सकता है।''
भारत, पूर्वी अमेरिका और अमेजन सबसे ज्यादा प्रभावित
अध्ययन के अनुसार, इस सदी की शुरुआत में भारत की अत्यधिक प्रदूषित नदी गंगा में ऑक्सीजन की कमी वैश्विक औसत की तुलना में 20 गुना अधिक तेजी से हो रही थी। विश्लेषण में कहा गया कि यदि वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में मध्यम या उच्च स्तर की बढ़ोतरी जारी रही तो इस सदी के अंत तक पूर्वी अमेरिका, आर्कटिक, भारत और दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्से की नदियां अपनी लगभग 10 प्रतिशत ऑक्सीजन खो सकती हैं।
ची गुआन ने कहा कि उन्हें खास तौर पर उष्णकटिबंधीय नदियों, जैसे ब्राजील की अमेजन नदी को लेकर अधिक चिंता है। पिछले वर्ष प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया था कि 1980 के बाद से अमेजन में 'जीवनविहीन' दिन की संख्या हर दशक में लगभग 16 दिन बढ़ी है।
नीदरलैंड के 'यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय' में जल विज्ञान के प्रोफेसर मार्क बीरकेंस ने कहा कि उनके और उनके सहयोगियों के पिछले वर्ष किए गए अध्ययन में पाया गया कि दुनिया की नदियों में ऑक्सीजन संकट हर दशक में 13 दिन बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे धरती और गर्म होगी, ये आंकड़े और तेजी से बढ़ सकते हैं।
गुआन के अध्ययन में नदियों में ऑक्सीजन का स्तर घटने के पीछे कई कारण बताए गए हैं जिनमें उर्वरकों व शहरों से निकलने वाले अपशिष्ट के कारण बढ़ता प्रदूषण, बांधों का निर्माण, जल प्रवाह में बदलाव तथा हवा और मौसम से जुड़ी परिस्थितियां शामिल हैं।
हालांकि अध्ययन में पाया गया कि लगभग 63 प्रतिशत समस्या का कारण पानी का गर्म होना है।
ड्यूक विश्वविद्यालय की पारिस्थितिकीविद और जैव-भू-रसायन विशेषज्ञ एमिली बर्नहार्ट ने कहा, ''जैसे-जैसे नदियों का पानी गर्म होता जा रहा है, पहले से मौजूद प्रदूषण की समस्याएं और गंभीर रूप लेती जा रही हैं। इसके कारण ऑक्सीजन की कमी की स्थिति अधिक व्यापक, लंबे समय तक बनी रहने वाली और ज्यादा खतरनाक होती जा रही है।''
उन्होंने कहा कि पानी में प्रदूषण कम करना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है, लेकिन नदियों के लगातार गर्म होने के कारण यह काम और कठिन होता जाएगा।
एपी
खारी अमित
अमित
1605 0942 वाशिंगटन