गुड़ियों का अनोखा संसार: एक छत के नीचे 60 देशों की संस्कृति, संकट में अस्तित्व
नरेश
- 17 May 2026, 05:53 PM
- Updated: 05:53 PM
(सोमवार को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर विशेष)
जयपुर, 17 मई (भाषा) राजस्थान की राजधानी जयपुर को अपने भव्य किलों और महलों के लिए जाना जाता है, लेकिन शहर के शोर-शराबे के बीच एक ऐसा 'छोटा संसार' भी बसा है जो गुमनामी के अंधेरे में अपनी पहचान खो रहा है। यह है जयपुर का 'गुड़िया संग्रहालय', जहाँ भारत सहित दुनिया के लगभग 60 देशों की संस्कृतियाँ गुड़ियों के रूप में जीवंत हैं।
जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर सेठ आनंदीलाल पोद्दार मूक बधिर विद्यालय परिसर में स्थित यह संग्रहालय किसी जादुई दुनिया से कम नहीं है। इसकी स्थापना के पीछे एक समृद्ध इतिहास है।
विद्यालय के प्रधानाचार्य भरत जोशी के अनुसार, 7 दिसंबर 1974 को कांति कुमार पोद्दार ने इसकी आधारशिला रखी थी और 7 अप्रैल 1979 को राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने इसका उद्घाटन किया था। मूल रूप से 'भगवानी बाई सेखसरिया गुड़िया घर' के नाम से पहचाने जाने वाले इस संग्रहालय में आज 500 से अधिक गुड़ियाँ प्रदर्शित हैं। यह संग्रहालय भारत के विभिन्न राज्यों सहित लगभग 60 देशों की सांस्कृतिक संरचना की एक आकर्षक झलक पेश करता है।
भरत जोशी ने बताया कि संग्रहालय की खासियत यह है कि भारत के हर राज्य के रहन-सहन और परिधान को समझाने के लिए अलग-अलग गुड़ियाँ रखी गई हैं। संग्रहालय की हर गुड़िया अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की संस्कृति को उजागर करती है। इनके जरिए संबंधित देश की संस्कृति, सभ्यता, पोशाक, व्यवसाय और रीति-रिवाज की जानकारी मिलती है।
यहां जापान, सऊदी अरब, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, अफगानिस्तान, ईरान, अमेरिका, ब्रिटेन, बुल्गारिया, स्पेन, डेनमार्क, मिस्र, जर्मनी, ग्रीस, मेक्सिको, आयरलैण्ड जैसे देशों की गुड़ियाँ अपनी पारंपरिक पोशाकों में सजी हैं।
जापान से प्राप्त पारंपरिक गुड़ियों के संग्रह में अधिकांश लकड़ी से बनी हैं और इनमें कोकेशी गुड़ियां, नामाहागे गुड़ियां, कामाकुरा गुड़ियां, कांटो मत्सुरी गुड़ियां और तानाबाता गुड़ियां शामिल हैं। जापान से कागज और व्हेल के दांतों से बनी गुड़ियां भी संग्रहालय में प्रदर्शित की गयी हैं।
विद्यालय प्रशासन के मुताबिक, इसके अलावा राजस्थान की पारंपरिक कठपुतलियां भी यहां हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, असम, बंगाल, नगालैण्ड, बिहार आदि प्रदेशों की सांस्कृतिक विविधता को यहां गुड़ियों के युगल के माध्यम से बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया है। संग्रहालय में सबसे छोटी गुड़िया 2 इंच की है। वहीं, कई प्रकार के कार्टून और सुपरहीरो चरित्रों की गुड़ियाँ भी यहां देखने को मिलती हैं।
प्रधानाचार्य भरत जोशी ने बताया कि जयपुर का गुड़िया संग्रहालय गुड़ियों के इतिहास से भी रूबरू करवाता है। उन्होंने संग्रहालय में उपलब्ध दस्तावेजों के हवाले से बताया कि विलेन डॉर्फ वीनस (28,000 ईसा पूर्व 25,000 ईसा पूर्व) को दुनिया की पहली गुड़िया माना जाता है जो एक महिला की आकृति है। इसे साल 1908 में पुरातत्वविदों ने ऑस्ट्रिया के एक गांव, विलेन डॉर्फ के पास एक पुरापाषाणकालीन स्थल पर खोजा था।
जोशी ने बताया कि भारत में सबसे पुरानी खिलौने वाली गुड़िया सिंधु घाटी सभ्यता से मिली, जो तकरीबन 5000 साल पुरानी है।
संग्रहालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, सबसे पुरानी गुड़ियाँ मिट्टी, पत्थर, लकड़ी, लोहा, चमड़ा या मोम से बनाई गई थीं, लेकिन इन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाला सामान भी वक्त के साथ बदलता रहा है। उन्नीसवीं सदी में गुड़ियों के सिर पोर्सेलिन के साथ बनने लगे, जिनका शरीर चमड़े, कपड़े, लकड़ी या पेपियर मैश का बना था। इसके बाद 20वीं सदी में प्लास्टिक और पॉलीमर का उपयोग गुड़िया बनाने में शुरू हो गया।
हैरानी की बात है कि यह है कि पर्यटन से करोड़ों रुपये का राजस्व अर्जित करने वाले जयपुर शहर में यह संग्रहालय सैलानियों की कमी से जूझ रहा है।
सेठ आनंदीलाल पोद्दार मूक-बधिर विद्यालय प्रशासन के अनुसार, एक समय था जब शहर के विभिन्न विद्यालयों से छात्र सप्ताह में दो-तीन बार यहाँ शैक्षिक भ्रमण के लिए आते थे, लेकिन धीरे-धीरे स्कूली छात्रों का आना भी बंद हो गया। प्रशासन के अनुसार, उचित प्रचार-प्रसार के अभाव में यह संग्रहालय अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। प्रशासन ने इसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से पर्यटन विभाग को विस्तृत जानकारी वाली एक बुकलेट भेजकर सहयोग की अपील भी की थी, परंतु स्थिति जस की तस बनी हुई है।
पर्यटकों की कमी का एक बड़ा कारण पर्यटक गाइड का उदासीन रवैया भी है। अक्सर गाइड पर्यटकों को केवल आमेर, नाहरगढ़, सिटी पैलेस और अल्बर्ट हॉल जैसे चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों तक ही सीमित रखते हैं, जिसके कारण पर्यटकों को इस अनूठे संग्रहालय की जानकारी ही नहीं मिल पाती। वहीं, गाइड का तर्क है कि विदेशी पर्यटकों के सीमित 'टूर प्लान' में केवल प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों को ही प्राथमिकता दी जाती है।
इस समय संग्रहालय को देखने के लिए नाममात्र का शुल्क लिया जाता है जिसमें छात्र 10 रुपए, वयस्क 20 रुपए और विदेशी मेहमान 100 रुपये का शुल्क देकर इसे देख सकते हैं। संग्रहालय से होने वाली आय को इसके रखरखाव पर खर्च किया जाता है।
भाषा बाकोलिया दिलीप नरेश
नरेश
1705 1753 जयपुर