रस्किन बॉन्ड 92 साल के हुए: जब 20 आलू टिक्की खा गए थे 'रस्टी'
नरेश
- 18 May 2026, 08:33 PM
- Updated: 08:33 PM
(माणिक गुप्ता)
देहरादून, 18 मई (भाषा) फूलों से भरा हरा-भरा बगीचा, चहचहाते पक्षी, चमकता सूरज और 'रस्टी' को घेरे खड़े ढेर सारे बच्चे। भारत के चहेते लेखक रस्किन बॉन्ड 92 वर्ष के होने वाले हैं और उनके जन्मदिन का आयोजन उनके व्यक्तित्व की तरह ही हास्य से भरपूर रहा।
रीढ़ की सर्जरी से उबर रहे और व्हीलचेयर पर आश्रित होने की वजह से वह शारीरिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन उनका उत्साह बरकरार है। वह अपने श्रोताओं को 20 आलू टिक्की खाने के किस्से, भारत के प्रति अपने गहरे प्रेम, दोस्ती और बुढ़ापे को सहजता से स्वीकार करने जैसे अनुभवों से मंत्रमुग्ध करते हैं। वह एक भाव से दूसरे भाव में सहजता से प्रवेश करते हैं—ठीक अपनी किताबों की तरह।
मंगलवार को 92 वर्ष के होने जा रहे बॉन्ड ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में बीते दिनों को याद करते हुए कहा, "जब मैं देहरादून में लड़का था, तो मैं क्लॉक टॉवर के पास चाट की दुकान पर जाया करता था और गोलगप्पे, टिक्की और चाट खाता था। कुछ समय के लिए मेरे नाम सबसे ज्यादा टिक्की खाने का रिकॉर्ड भी था। मैंने एक बार में 20 टिक्की खाई थी और मैं आज भी जिंदा हूं।''
बहुत कम लेखक 75 वर्षों के कहानी लेखन, 500 से अधिक प्रकाशित रचनाओं और पीढ़ियों से समर्पित पाठकों का दावा कर सकते हैं, और उससे भी कम लेखक बॉन्ड की विशिष्ट सहजता के साथ इस बारे में खुलकर हंस सकते हैं।
उत्तराखंड की पहाड़ियों में स्थित धुंध भरे लैंडौर में अपने घर आइवी कॉटेज से दूर, इस बार वह स्वास्थ्य कारणों से देहरादून में अपना जन्मदिन मना रहे हैं।
पिछले सप्ताह उनकी नवीनतम पुस्तक "ऑल-टाइम फेवरेट फ्रेंडशिप स्टोरीज" के विमोचन के अवसर पर बॉन्ड के जन्मदिन से पहले एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हल्के गुलाबी रंग की टी-शर्ट पहने, बॉन्ड धूप में बैठे अपने प्रशंसकों के प्रेम और अपनत्व का आनंद लेते नजर आए।
जब उनसे पूछा गया कि वह अपने साहित्यिक जगत के किस पात्र को अपने 92वें जन्मदिन के जश्न में आमंत्रित करना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि अपनी पहली पुस्तक "द रूम ऑन द रूफ" (1956) के अपने सबसे अच्छे दोस्त सोमी को। इस किताब को उन्होंने 1956 में महज 17 साल की उम्र में लिखा था।
बॉन्ड भारत के प्रति अपने प्रेम को खुलकर व्यक्त करते हैं।
उन्होंने कहा, ''...क्योंकि भारत ही मेरा दिल और आत्मा है। मैं 17 साल की उम्र में भारत छोड़कर चला गया था, और तीन-चार साल बाद वापस आ गया क्योंकि मुझे पता था कि मैं पश्चिम में खुश नहीं रह पाऊंगा क्योंकि मेरा दिल और आत्मा यहीं थी... मुझे भारत की हर चीज की याद आती थी। सिर्फ लोग या जगहें ही नहीं, बल्कि यहां का माहौल।''
उन्होंने मौजूद छात्रों को यह जवाब दिया, जिनमें से कई अपने हाथों में ग्रीटिंग कार्ड लिए हुए थे और उत्सुकता से उनके साथ फोटो खिंचवाने या उनकी किताब की हस्ताक्षरित प्रति पाने का इंतजार कर रहे थे।
उन्होंने कहा "जब मैंने देहरादून में लिखना शुरू किया, तब मैं लगभग 16 या 17 साल का था। मैंने अभी-अभी स्कूल की पढ़ाई पूरी की थी और मुझे लगता था कि मैं अंग्रेज़ी, इतिहास और भूगोल में अच्छा हूँ। लेकिन मुझे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि मैं गणित, भौतिकी या रसायन विज्ञान में पास नहीं हो पाया। इसलिए मैंने सोचा कि सबसे समझदारी भरा काम एक लेखक बनना होगा। और इसी तरह मैंने कहानियाँ लिखना शुरू किया।''
1934 में कसौली में ब्रिटिश माता-पिता, एडिथ क्लार्क और ऑब्रे बॉन्ड के यहाँ जन्मे बॉन्ड केवल चार वर्ष के थे, जब उनकी माँ उनके पिता से अलग हो गईं और एक भारतीय से विवाह कर लिया।
हालाँकि बॉन्ड को उनके पिता को सौंप दिया गया लेकिन जल्द ही वे देहरादून में अपनी दादी के घर चले गए। वे जामनगर, शिमला, नई दिल्ली और देहरादून में पले-बढ़े, और आखिरकार 1963 में लैंडौर को अपना घर बना लिया।
"आल टाइम फेवरिट फ्रैंडशिप स्टोरीज'' के मनमोहक कवर से प्रेरित, चमकीले पीले और नीले रंग के केक को काटते हुए हमेशा मुस्कुराने वाले बॉन्ड ने बढ़ती उम्र के बारे में शिकायत के साथ नहीं, बल्कि कृतज्ञता और गरिमा के साथ स्वीकार किया। केक पर विभिन्न प्रकार के चित्र और अपनी लिखने की मेज़ पर बैठे हुए उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीर बनी थी।
भाषा आशीष नरेश
नरेश
1805 2033 देहरादून