उच्चतम न्यायालय ने यूएपीए मामलों में दोषसिद्धि की कम दर को लेकर चिंता जताई
माधव
- 18 May 2026, 09:52 PM
- Updated: 09:52 PM
नयी दिल्ली, 18 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दोषसिद्धि की कम दर को लेकर सोमवार को चिंता जताई और कहा कि ऐसे 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में दोषियों को बरी कर दिया जाता है।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने नार्को-आतंकवाद मामले में आरोपी जम्मू-कश्मीर निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए ये टिप्पणियां कीं।
उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा संकलित आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि यूएपीए के तहत देशव्यापी दोषसिद्धि का प्रतिशत दो प्रतिशत और छह प्रतिशत के बीच रहा है।
पीठ ने कहा, ''दूसरे शब्दों में कहें तो, देश में ऐसे मामलों में बरी होने की संभावना 94 से 98 प्रतिशत तक है। वहीं, जब केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की बात आती है, तो वहां दोषसिद्धि की दर बेहद कम है, कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है।''
इसने कहा, ''उपर्युक्त अवधि के लिए, दोषसिद्धि की वार्षिक दर हमेशा एक प्रतिशत से कम रही है। इसका मतलब यह है कि मुकदमे के अंत में, ऐसे मामलों में बरी होने की 99 प्रतिशत संभावना होती है। ऐसे आंकड़े हमारे सामने होने पर सवाल यह उठता है कि क्या केवल आरोप गंभीर होने के कारण हम अपीलकर्ता को हिरासत में रखना जारी रखें या फिर इस पर विचार को बाद के चरण तक टाल दें?''
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि उचित विचार-विमर्श के बाद, उसका मानना है कि अंद्राबी ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान जमानत दिए जाने का मामला साबित कर दिया है, क्योंकि अपीलकर्ता के पास से या अपीलकर्ता के निवास या कार्यस्थल से कोई नकदी या प्रतिबंधित वस्तु बरामद नहीं हुई है।
पीठ ने कहा, ''अपीलकर्ता को दोषी ठहराने वाले सभी बयान पुलिस के समक्ष दिए गए हैं, जिनमें अपीलकर्ता द्वारा कथित रूप से किए गए इकबालिया बयान भी शामिल हैं, जो प्रथम दृष्टया आत्म-दोषसिद्धि के प्रमाण हैं और साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25 के अंतर्गत आते हैं।''
इसने कहा, ''अपीलकर्ता का मादक पदार्थों की तस्करी या आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े होने का कोई पूर्व रिकॉर्ड नहीं है। कम से कम, ऐसा कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया है।''
पीठ ने कहा, ''इसके विपरीत, यह कहा गया है कि अपीलकर्ता भारत की संवैधानिक, संघीय और लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रबल समर्थक है।
वह जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के समर्थक हैं, जो एक पंजीकृत मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी है।''
अंद्राबी ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि मोबाइल फोन रिकॉर्ड की जांच से पता चलता है कि अंद्राबी सीमा पार आतंकी संगठनों के संपर्क में था।
एनआईए ने मामले में जांच से लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी तक के घटनाक्रम को बताया। उसने कहा कि 11 जून 2020 को पुलिस ने हंदवाड़ा के कैरो ब्रिज पर अब्दुल मोमिन पीर की कार को रोका था। तलाशी के दौरान 20.01 लाख रुपये नकद और दो किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई और पीर को गिरफ्तार कर लिया गया।
बाद में उसके खुलासे पर अंद्राबी और इस्लाम-उल-हक पीर को गिरफ्तार किया गया।
आरोपपत्र के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी कथित तौर पर पाकिस्तान में स्थित अपने सहयोगियों से हेरोइन प्राप्त करने के बाद जम्मू कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में सीमा पार तस्करी और आपूर्ति में शामिल था।
आरोपपत्र में कहा गया है कि अंद्राबी और अब्दुल मोमिन पीर ने 2016-17 के दौरान कई बार पाकिस्तान का दौरा किया था ताकि वे आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन (एचएम) के सदस्यों से मिल सकें। इसमें यह भी कहा गया है कि हेरोइन की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग आरोपियों ने लश्कर-ए-तैयबा की आतंकवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया था।
भाषा
देवेंद्र माधव
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