न्यायालय ने उमर खालिद, शरजील इमाम को जमानत से मना करने के पूर्व के फैसले पर उठाए सवाल
अविनाश
- 18 May 2026, 09:52 PM
- Updated: 09:52 PM
नयी दिल्ली, 18 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार के पांच जनवरी के अपने फैसले पर सवाल उठाते हुए सोमवार को कहा कि ''जमानत नियम है तथा जेल अपवाद'' और यह महज खोखला वैधानिक बयान नहीं है।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने हंदवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ द्वारा दिए गए तर्क पर उसे ''गंभीर आपत्ति'' है।
पांच जनवरी को, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन वी अंजारी की पीठ ने खालिद और इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि वे गवाहों की गवाही के एक वर्ष बाद नयी जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं।
सोमवार को सुनाए गए अपने आदेश में, न्यायमूर्ति भुइयां ने पांच जनवरी के फैसले के विभिन्न पहलुओं की आलोचना की, जिसमें दोनों अपीलकर्ताओं के एक वर्ष की अवधि के लिए जमानत मांगने के अधिकार को समाप्त करना भी शामिल है।
उन्होंने कहा कि पांच जनवरी का फैसला के ए नजीब मामले में निर्णय का सही तरीके से पालन नहीं करता, जिसमें यह कहा गया कि सुनवाई में बहुत देरी गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत मामलों में जमानत का आधार हो सकती है।
पीठ ने कहा, ''गुलफिशा फातिमा मामले में फैसले के विभिन्न पहलुओं पर हमें गंभीर आपत्तियां हैं, जिनमें दोनों अपीलकर्ताओं के एक वर्ष की अवधि के लिए जमानत मांगने के अधिकार को समाप्त करना भी शामिल है।''
न्यायालय ने कहा कि "जमानत नियम है और जेल अपवाद" - यह दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) से निकला महज एक खोखला वैधानिक बयान नहीं है।
पीठ ने कहा, ''यह अनुच्छेद 21 और 22 से निकला एक संवैधानिक सिद्धांत है और निर्दोष होने की धारणा कानून के शासन द्वारा शासित किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है।''
न्यायालय ने कहा, 'हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि यूएपीए के तहत भी 'जमानत नियम है और जेल अपवाद'; हालांकि, किसी उपयुक्त मामले में, उस विशेष मामले के तथ्यों को देखते हुए जमानत से इनकार किया जा सकता है।''
पीठ ने गुरविंदर सिंह बनाम भारत संघ मामले में 2024 में दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए फैसले को भी अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें के ए नजीब मामले में पारित फैसले को लागू नहीं किया गया था।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि के.ए. नजीब मामले में उसका फैसला बाध्यकारी कानून है और अधीनस्थ अदालतों, उच्च न्यायालयों या यहां तक कि उच्चतम न्यायालय की अधीनस्थ पीठों द्वारा भी इसे कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
नजीब मामला यूएपीए के तहत जमानत के संबंध में 2021 में दिया गया उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक फैसला है।
सैयद इफ्तिखार अंद्राबी ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि मोबाइल फोन रिकॉर्ड की जांच से पता चलता है कि अंद्राबी सीमा पार आतंकी संगठनों के संपर्क में था।
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने मामले में जांच से लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी तक के घटनाक्रम को बताया। उसने कहा कि 11 जून 2020 को पुलिस ने हंदवाड़ा के कैरो ब्रिज पर अब्दुल मोमिन पीर की कार को रोका था। तलाशी के दौरान 20.01 लाख रुपये नकद और दो किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई और पीर को गिरफ्तार कर लिया गया।
बाद में उसके खुलासे पर अंद्राबी और इस्लाम-उल-हक पीर को गिरफ्तार किया गया।
आरोपपत्र के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी कथित तौर पर पाकिस्तान स्थित अपने सहयोगियों से हेरोइन प्राप्त करने के बाद जम्मू कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में सीमा पार तस्करी और आपूर्ति में शामिल था।
आरोपपत्र में कहा गया है कि अंद्राबी और अब्दुल मोमिन पीर ने 2016-17 के दौरान कई बार पाकिस्तान की यात्रा की थी ताकि वे आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन (एचएम) के सदस्यों से मिल सकें। इसमें यह भी कहा गया है कि हेरोइन की बिक्री से प्राप्त राशि का इस्तेमाल आरोपियों ने लश्कर-ए-तैयबा की आतंकवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया था।
भाषा आशीष अविनाश
अविनाश
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