ओडिशा की सरपंच ने लिया मासिक धर्म से जुड़ीं वर्जनाएं तोड़ने का संकल्प, शुरू किया अभियान
नरेश
- 09 Jun 2026, 05:57 PM
- Updated: 05:57 PM
भुवनेश्वर, 10 जून (भाषा) ओडिशा के कटक जिले की हरिअंता ग्राम पंचायत की सरपंच पद्मिनी प्रधान ग्रामीण समुदायों में मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने के लिए एक अभियान चला रही हैं।
प्रधान (45) गांव-गांव जाकर किशोरियों, माताओं और बुजुर्ग महिलाओं से मासिक धर्म स्वच्छता, सैनिटरी पैड के सुरक्षित उपयोग और मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं वाले स्कूलों के महत्व पर चर्चा कर रही हैं।
उन्होंने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, "गांवों में आज भी कई लड़कियां मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं जातीं क्योंकि शौचालय गंदे होते हैं, पानी की सुविधा नहीं होती या फिर वे शर्म महसूस करती हैं।"
उन्होंने कहा, "हम स्कूलों में शौचालयों को बेहतर बनाने और यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि लड़कियों को आवश्यक सुविधाएं मिलें, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।"
हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार, ओडिशा में सर्वेक्षण में शामिल लगभग 74 प्रतिशत लड़कियों ने बताया कि वे मासिक धर्म के दौरान हर चक्र में एक से आठ दिन तक स्कूल नहीं जा पातीं। यूनिसेफ, एम्स-भुवनेश्वर, आईआईटी भुवनेश्वर तथा विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय हितधारकों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस सर्वेक्षण से पता चला कि स्कूल से अनुपस्थित रहने के प्रमुख कारण दर्द और असुविधा थे।
सर्वेक्षण के अनुसार इसके बाद सुविधाओं की कमी, पर्याप्त गोपनीयता का अभाव और मासिक धर्म को समाज में बुरा समझा जाना प्रमुख कारणों के रूप में सामने आए।
प्रधान ने कहा, "हालांकि हमें अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है, लेकिन स्थिति में सुधार हो रहा है। खासकर युवा लड़कियों के बीच मासिक धर्म को लेकर बातचीत धीरे-धीरे बदल रही है।"
उन्होंने कहा, "जब लड़कियां किसी दूसरी महिला को मासिक धर्म स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करते हुए सुनती हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। पहले वे सैनिटरी पैड को बैग या कपड़ों के अंदर छिपाकर रखती थीं। अब उनमें से कुछ खुलकर मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़े सवाल पूछती हैं।"
प्रधान अपने अनुभवों के कारण आज मासिक धर्म के बारे में खुलकर बोल पा रही हैं।
प्रधान ने कहा, "मैंने बहुत कम उम्र में पहली बार मासिक धर्म का सामना किया। मुझे समझ ही नहीं आया कि मेरे साथ क्या हो रहा है। मैं इतनी डर गई और शर्मिंदा हो गई कि तीन दिन तक मैं अपने परिवार में किसी को कुछ बता भी नहीं पाई।"
उन्होंने कहा, "उस समय जागरूकता नहीं थी और कोई भी अपनी बेटियों से इन बातों पर खुलकर बात नहीं करता था।"
प्रधान ने बताया कि बाद में जब उनके परिवार को पता चला, तो उन्हें पारंपरिक शुद्धिकरण अनुष्ठानों से गुजरना पड़ा।
उन्होंने कहा, " गाय का गोबर लगाकर पानी से मुझे नहलाया गया ताकि मुझे फिर से 'शुद्ध' किया जा सके। मैंने जो कपड़े पहने थे, उन्हें पूरी तरह धोने के लिए धोबी के पास भेजा गया। ये सभी प्रथाएं उस समय मासिक धर्म को बुरा समझने और गलत धारणाओं को दिखाती हैं।"
ओडिशा में अध्ययन और रिपोर्ट बताते हैं कि कई समुदायों में मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाएं आज भी मौजूद हैं।
ओडिशा पर यूएनएफपीए की एक रिपोर्ट में ऐसी प्रथाओं के बारे में बताया गया है जिनमें मासिक धर्म के दौरान लड़कियों को रसोई और मंदिर में जाने से रोका जाता है, उन्हें अलग कमरों में रखा जाता है और नहाने भी नहीं दिया जाता।
बीएमसी वुमेंस हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में कहा गया है कि खराब मासिक धर्म स्वच्छता, सामाजिक बाधाएं और उत्पादों तक सीमित पहुंच राज्य में महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा को प्रभावित करती है।
भाषा जोहेब नरेश
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