दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र के एचपीवी टीकाकरण अभियान पर रोक लगाने से इनकार किया
नेत्रपाल
- 29 Jul 2026, 09:26 PM
- Updated: 09:26 PM
नयी दिल्ली, 29 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के एचपीवी टीकाकरण अभियान पर रोक लगाने से बुधवार को इनकार कर दिया, लेकिन साथ ही कहा कि ''अधूरे परीक्षण वाले टीके'' जनता को नहीं लगाए जाने चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा 14 वर्ष की बालिकाओं को 55 लाख टीके लगाए जाने संबंधी प्रस्तुत आंकड़ों से किसी भी ''तत्काल नुकसान'' का संकेत नहीं मिलता, इसलिए टीकाकरण अभियान पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं दिखता।
अदालत ने हालांकि यह भी कहा कि इस मामले में ''गंभीर मुद्दे'' उठाए गए हैं, क्योंकि पहले भी टीकों के परीक्षण और इनके उपयोग के लिए मंजूरी देने संबंधी निर्धारित प्रोटोकॉल के उल्लंघन के मामले सामने आ चुके हैं।
इसने कहा कि ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां टीकों को उपयोग में लाने से पहले आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हालांकि, अदालत ने इस मामले में नियमों का पालन हुआ है या नहीं, इस पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया। साथ ही इसने कहा कि इस मामले को पूरी गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा, ''अधूरे परीक्षण वाले टीके नहीं लगाए जाने चाहिए। हमारा उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आवश्यक प्रोटोकॉल का पालन किया जाए।''
पीठ उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अधिकारियों को एचपीवी टीकों को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने के फैसले पर पुनर्विचार और समीक्षा करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
याचिका में इन टीकों की दीर्घकालिक सुरक्षा, टीका लगवाने वालों की सहमति न लेने और टीकाकरण के बाद होने वाली किसी भी प्रतिकूल घटना की निगरानी व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि एचपीवी टीकाकरण को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) में शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि 25 जुलाई तक लगाए गए 55 लाख टीकों में से 120 मामलों में प्रतिकूल प्रभावों की सूचना मिली और इनमें से केवल 42 मामलों में ही स्थिति ''थोड़ी गंभीर'' हुई, जबकि टीकाकरण के बाद किसी भी मृत्यु की सूचना नहीं मिली।
विधि अधिकारी ने आश्वासन दिया कि एचपीवी टीकों को शुरू करने से पहले सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का विधिवत पालन किया गया था।
अधिवक्ता आशीष दीक्षित भी केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए।
जनहित याचिका के अनुसार, तमिलनाडु की 14 वर्षीय एक लड़की को 30 मार्च, 2026 को कनाई स्थित सरकारी अस्पताल में एचपीवी का टीका लगाया गया था।
याचिका में आरोप लगाया गया कि तीन से चार दिनों के भीतर उसमें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर लक्षण विकसित हो गए, जिनमें आवाज का चले जाना, शरीर के एक तरफ लकवा जैसी स्थिति, चलने में असमर्थता और धुंधला तथा कम दिखाई देना शामिल था।
इसमें कहा गया कि उसे गंभीर स्थिति में आईसीयू में भर्ती करना पड़ा, जहां उसे नसों के जरिए दवाएं दी गईं। वह कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रही, लेकिन उसकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया।
याचिका में दावा किया गया कि ग्वालियर और बिहार से सामने आए इसी तरह के मामलों ने टीकों की सुरक्षा और निगरानी को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
इसमें कहा गया कि इस टीके का लंबे समय तक प्रभाव कितना रहेगा, यह भी ''स्पष्ट नहीं है''।
इस मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
भाषा
देवेंद्र नेत्रपाल
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