पार्सल श्रमिक पिछले लगभग ढाई साल से रेलवे बोर्ड से चिकित्सा सुविधाओं की कर रहे हैं प्रतीक्षा
माधव
- 25 May 2026, 05:19 PM
- Updated: 05:19 PM
नयी दिल्ली, 25 मई (भाषा) देशभर में रेलवे परिसर में पार्सल को लादने और उतारने में लगे हजारों निजी श्रमिक पिछले ढाई साल से रेलवे बोर्ड से चिकित्सा सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
रेलवे की पार्सल सेवा के तहत, विभिन्न वस्तुओं और उत्पादों के परिवहन के लिए एक्सप्रेस और मेल रेलगाड़ियों में दो यात्री-सह-सामान डिब्बे (एसएलआर) जोड़े जाते हैं।
मुख्य श्रम आयुक्त के कार्यालय ने सितंबर 2023 में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष से माल को लादने और उतारने के काम में लगे श्रमिकों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने और मानवीय आधार पर उन श्रमिकों के लिए रेलवे अस्पतालों में चिकित्सा व्यवस्था की यूनियन की मांग पर विचार करने का अनुरोध किया था, जो अक्सर अपने कर्तव्यों का पालन करते समय घायल हो जाते हैं।
आयुक्त कार्यालय ने जनवरी 2024 में 'इंडियन रेलवे लोडिंग/अनलोडिंग वर्कर्स यूनियन' की मांग पर विचार करने की अपनी अपील को दोहराया।
यूनियन ने हालांकि कहा कि कई बार अनुरोध किए जाने के बावजूद, रेलवे बोर्ड ने न तो श्रम आयुक्त के पत्र का जवाब दिया है और न ही श्रमिकों को कोई आश्वासन दिया है।
यूनियन के अनुसार ये श्रमिक देशभर में रेलवे परिसर में निजी तौर पर काम करते हैं लेकिन रेलवे से उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता है। वे अपना वेतन सीधे उन निजी कंपनियों से कमाते हैं जो पार्सल सेवाओं के माध्यम से माल का परिवहन करती हैं।
श्रमिक संघ के अध्यक्ष राज कुमार इंदोरिया ने कहा, ''दिल्ली में, विभिन्न प्लेटफार्म पर माल लादने और उतारने की सेवाओं में लगभग 5,000 कर्मचारी कार्यरत हैं। अकेले नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही 800 से अधिक कर्मचारी हैं।''
उन्होंने कहा, ''हम पिछले 40 वर्षों से यह काम कर रहे हैं, लेकिन रेलवे बोर्ड ने हमारे लिए कुछ नहीं किया है।''
उन्होंने कहा, "पार्सल भेजने के लिए रेलवे स्टेशनों पर आने वाली निजी कंपनियां या व्यक्ति सामान लादने और उतारने के लिए सीधे हमें भुगतान करते हैं। हम रेलवे परिसर में काम करते हैं, लेकिन हमें बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पार्सल क्षेत्र के पास आपको एक भी वाटर कूलर नहीं मिलेगा।''
यूनियन के पदाधिकारियों ने कहा कि ये श्रमिक भारी बोझ या तो अपने सिर पर उठाते हैं या ढुलाई गाड़ियां खींचकर ले जाते हैं और काम की प्रकृति खतरनाक होने के कारण शारीरिक चोटें लगना आम बात है।
इंदोरिया ने कहा, ''घायल होने वाले श्रमिकों को अपने इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ता है। इससे काम के दिनों और कमाई का नुकसान भी होता है। हमने देशभर के रेलवे अस्पतालों में मुफ्त इलाज की मांग की है, लेकिन रेलवे बोर्ड ने हमारी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया है।''
उन्होंने कहा, ''हमने मुख्य श्रम आयुक्त से मुलाकात की और उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बताया। उन्होंने इस बात पर सहमति जताई कि हमें कम से कम चिकित्सा सुविधाएं तो मिलनी चाहिए और रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को पत्र भी लिखा, लेकिन उससे भी कोई मदद नहीं मिली।''
भाषा
देवेंद्र माधव
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